प्रश्न : विज्ञान के हिसाब से केन्द्रों में तो उतने ही अंश होते हैं, जितना सारे परिवेश से मिलाकर होते हैं, या उससे कम या ज्यादा, दोनों हो सकते हैं। प्रथम परिवेश में दो हो सकते हैं, दूसरे में अधिकतम 8 हो सकते हैं, तीसरे परिवेश में 18 हो सकते हैं, चौथे में 32 हो सकते हैं। ऐसा 2n2 हिसाब से चलते हैं।
उत्तर : वो किसी एक प्रजाति के परमाणु हुआ ना।
प्रश्न : सभी प्रजाति के परमाणुओं में ऐसा ही होता है, इसमें ज्यादा नहीं होना चाहिए, उससे कम हो सकते हैं। ऐसा हो सकता है, कि तीसरा परिवेश में पूरा नहीं हुआ, उसके बाद भी चौथा परिवेश शुरू हो गया।
उत्तर : ठीक हैं, इससे ज्यादा होने से तो आजीर्ण परमाणु हो जाते हैं ना, इससे कम होने से भूखे हो गये।
प्रश्न : विज्ञान के हिसाब से अजीर्ण में भी संख्या का क्रम चलता ही है, उससे ज्यादा नहीं हो सकते, लेकिन जो उसमें अंशों की स्थिति होती है, वो इतना loose होता है कि वो निकलकर बाहर जाते रहते हैं।
उत्तर : ठीक है न, बाहर निकलने का तो आखिरी orbit ही आती है, वो ठीक है। परमाणु अंशों की संख्या सभी orbit में जितना होता है, उसके समान में या उससे अधिक बीच में होना ये हर भौतिक परमाणुओं का ये स्वाभाविक बात है। इसमें तो कोई शंका नहीं है, अब रह गया हर प्रजाति की परमाणु में, दो अंश रहता है तो कहाँ रहता है ये परमाणु? कैसे लाओगे, दो ही अंशों का जो परमाणु है फिर कहाँ से लाओगे? तो फिर ये 2, 8, 18, 32 सिद्धांत कहाँ गया?
प्रश्न : प्रथम परिवेश में दो से ज्यादा नहीं हो सकते, दो से कम तो हो सकते हैं।
उत्तर : ऐसा उनका सोचना है। हमारा सोचना ऐसा है, अजीर्ण परमाणु में अधिक होते ही हैं, सभी परिवेशों में अधिक होते ही हैं। भूखे परमाणु में कम होते ही हैं, भूखे परमाणु का मतलब ही होता है, कम होना।
प्रश्न : अजीर्ण का जो आखिरी परिवेश है, उसमें अंश इतने कम होते हैं कि उस आखिरी परिवेश को बनाए रखना मुश्किल होता है। कम या अधिक जो भी होते है, आखरी का orbit में रहते हैं, उसके पहले के orbit पूरे हो जाते हैं।
उत्तर : ठीक है, इसको ऐसे मान लेते हैं। इसका मतलब है, 61 अंश से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
प्रश्न : उससे ज्यादा हो सकते हैं, orbit की संख्या बढ़ सकती है।
उत्तर : जितना orbit बढ़ता है, उतना ज्यादा अजीर्ण होता है। जैसा भी हम orbits बढ़ाने जाते हैं, मध्यांश उसको manage करने में असमर्थ होता जाता है। उसको manage करना तकलीफ जाता है, वातावरण का दबाव बढ़ जाता है, ये बिखर जाता है, कुछ भी हो करके परिणाम घटित हो जाता है। इस ढंग से परमाणुओं के जो अंशों की संख्या के बारे में बहुत ज्यादा अपन निर्भर करने लगे, इतने ही संख्या में रहेगा ऐसा कोई जरूरी नहीं हैं। अधिकतम, न्यूनतम - न्यूनतम तो अपने को पता लगता ही है, कम से कम दो होना, ये तो पता लगता है। अधिकतम होने के