के सब काम किए करते हैं। नाभिकीय अंशों का जहाँ तक बात हैं, परिवेश में जितना अंश होता है, उतना ही होते हैं, किसी-किसी परमाणु में अधिक भी होते हैं।
प्रश्न : कम और अधिक का आधार क्या है?
उत्तर : कम और अधिक का आधार है जो अंशों का जो अपनाने की आधार पर है वो। परमाणु जो है ना भूखे परमाणु और अजीर्ण परमाणु बताया है। भूखे परमाणु अंशों को अपनाने में लगे रहते हैं, लगते समय में मिल गया तो दो तीन ज़्यादा भी ले लिया। इस ढंग से काम है ये।
प्रश्न : केन्द्र के अंशों का सभी अंशों के आवेशों को स्वाभाविक गति में लाने का कार्य किस प्रकार संपादित होता है?
उत्तर : मध्यस्थ बल का प्रयोग से ये स्वाभाव गति में आते हैं। उसके आवेश यही दो ही बताया आपको - दूर भागना और पास में आना। इसको निश्चित अच्छी दूरी में प्रवर्तित बनाए रखना ये मध्यस्थ क्रिया का प्रयोजन है। ये इसके अपने प्रभाव को डालता है, वो निश्चित अच्छी दूरी में आप स्वयं ही पदस्थ हो जाते हैं।
मध्यस्थ बल का मतलब ये है - सम, विषम आवेशों को सामान्य बनाने की प्रक्रिया, समावेश होने से, विषमावेश होने से। जब कभी भी सम आवेश होता है, तो वो जो पास में आ जाता है, प्यार से, सारे अंश। तब वो ज्यादा प्यार होना भी ठीक नहीं है, उसको निश्चित अच्छी दूरी में पदस्थ करता है। कभी-कभी रूठ करके, थोड़ा सा मुरझा करके दूर भागने लगते हैं, पुचकार करके पास में बुला देते हैं।
प्रश्न : ये रूठते और प्यार क्यूँ करते हैं ज्यादा?
उत्तर : इसीलिए प्यार करते हैं, ये परिवेशों की आधार है इसका - परिवेशीय दबाव। अकेले परमाणु तो हैं ही नहीं सह अस्तित्व में, बताया गया अनंत परमाणुओं के बीच में एक परमाणु काम करता रहता है, इन अनन्त परमाणुओं का दबाव किसी एक परमाणु के ऊपर अधिक आने से वो केन्द्रीय अंशों के पास में पहुँच जाते हैं। उसी में यदि परिवेशीय अंशों का यदि आकर्षण बढ़ जाती है, दूर भागना चाहेगें, इस ढंग से होकर दूर भागता रहता है तभी भी मध्यस्थ बल जो है उसको पास में बुला करके अवस्थित कर लेता है, यदि मध्यस्थ क्रिया के पास में आने की स्थिति में उसको निश्चित अच्छी दूरी में व्यवस्थित कर अपने में सुरक्षित हो जाता है।
प्रश्न : क्या नाभिक में अंशों का होना ही मध्यस्थ क्रिया कहलाया?
उत्तर : मध्यस्थ क्रिया कहलाया, उसमें मध्यस्थ बल, मध्यस्थ शक्ति दोनों समाहित रहते हैं। वो शक्ति का प्रयोग तभी होता है जब अतिवाद में आते हैं परिवेशीय अंश। अतिवाद का दो ही भाव होता है उसमें - एक पास में आना, एक दूर भागना। इतने ही होता है। तीसरा प्रकार का कुछ भी उत्पात नहीं होता है।
प्रश्न : किसी गठनशील परमाणु में अधिकतम कितने अंश हो सकते हैं?