गति है ही, मध्यांश के चारों ओर घूमने वाला बात है ही, साथ में घूर्णन गति और कम्पनात्मक गति। सम्पूर्ण परमाणु में ये तीनों गतियाँ हैं पर्याप्त।
मध्यस्थ बल में पहले आपको निवेदन किया, किसी भी परमाणु में मध्य में जितना अंश हैं, वो सब का सब घूर्णन गति में रहते हैं।ठीक है। इनके परस्परता में जो प्रभाव रहती है, गति का तो प्रभाव क्षेत्र बनता ही है, उन प्रभाव क्षेत्र का नाम है मध्यस्थ बल। मध्यांश के जो अंश हैं, उनके घूर्णन गति है, उसके प्रभाव को मध्यस्थ बल कह रहे हैं।ठीक हो गया उसका नियोजन दो ही जगह में जाता है - पास में आ जाने से या दूर भागने से ये मध्यस्थ बल दौड़ करके, उनको समझा-बुझा करके, अच्छे दूरी में अवस्थित कर देता है। Technically यही होता है, निश्चित दूरी में रहना पड़ेगा।
प्रश्न : पास आने से दूर कैसा जाता है, दूर जाने से पास कैसा आता है, उसका mechanism क्या है?
उत्तर : उसका विकर्षण रूप में अपना बल को परिवर्तित करके प्रभाव डालता है, फलस्वरूप दूर हटता है। ये आकर्षण बल को बढ़ाता है, तब जा करके पास में आ जाते हैं। कैसे बाबा ? मध्यस्थ बल में ये दोनों चीज़ निहित रहते हैं, आवश्यकता अनुसार उपयोग करो। मुख्य बिन्दु यही है। वातावरण के दबाव से पास दूर आते हैं, उसके आस-पास सब है ना सहअस्तित्व में। किसी को आकर्षण बल ज्यादा होने से दूर भागने की नौबत आती है, किसी का विकर्षण का बल ज्यादा बढ़ जाने से पास में आने की नौबत आती है, ये स्वाभाविक क्रिया है। ऐसे स्थितियाँ बन सकती हैं, ऐसे स्थिति को ठीक से सटीक अपने अस्त्त्वि को यथा स्थिति को बनाए रखने के लिए मध्यस्थ बल प्रयोजित होता है। अब अगर कोई आकर्षण बल लगाता है, परमाणु अंशों के ऊपर, मध्यांश क्या करता है? उससे ज्यादा आकर्षण बल लगा करके वो अपने स्थान में बैठा देते है।
प्रश्न : mechanism क्या है?परिवेश की निश्चित दूरी है, उससे यदि वो पास आ रहा है, तो विकर्षण बल हो जाता है। उसका आधार क्या है?
उत्तर : आधार यही है, जो अच्छी निश्चित दूरी, जिसमें व्यवस्था के रूप में होना निश्चित रहती है, व्यवस्था को पैदा करने के लिए पास आ गया, और उसी को व्यवस्था में अवस्थित करने के लिए बल प्रयोग होता है। अंतर बल प्रयोग। व्यवस्था को प्रकाशित करने के क्रम में अंतर बल का प्रयोग होता है।
प्रश्न : मध्य है, केंद्र है, केन्द्र से प्रथम परिवेश की एक निश्चित दूरी है, द्वितीय परिवेश की एक निश्चित दूरी है, यही परमाणु में व्यवस्था का स्वरूप है। उसको वो बनाए रखता है। उससे कम करेगें तो अव्यवस्था होने लगती है, विकर्षण पूर्वक दूर करेंगें। उससे दूर करेगें तो अव्यवस्था, तब आकर्षण बल को लगाना पड़ेगा।
उत्तर : इस प्रकार से जो परमाणु व्यवस्था के अर्थ में मध्यस्थ बल, आकर्षण विकर्षण पूर्वक अपने व्यवस्था को बनाए रखने में सक्षम हैं। व्यवस्था के अर्थ में ही ये व्याख्यायित हो पाता है। व्यवस्था स्वाभाविक चीज़ है, वांछित चीज़ है।
प्रश्न : गठनशील परमाणु की प्रकार की संख्या क्या निश्चित बताई जा सकती है?