उत्तर : मध्यस्थ बल क्या चीज़ है? आपको कल हम एक सूत्र बताए थे। मध्यांशों के पास यदि परिवेशीय अंश आने लगते हैं, उसको एक अच्छी दूरी में जो रहता, हुआ जगह में ही पुनः अवस्थित कराने के लिए, मध्यस्थ बल उपयोग हो जाता है। स्वयंस्फूर्त है वो। वो स्वयं स्फूर्त कैसा होता है? जो निश्चित अच्छी दूरी से वो लक्ष्मण रेखा से भीतर आने लगता है, वो मध्यस्थ बल को पता लगता है, संकेत होता है, भीतर आ रहा है। तुरंत अपने मध्यस्थ बल को नियोजित कर अच्छी स्थिति में पैदा कर देता है अच्छी स्थिति में अवस्थित कर देता है, अच्छी स्थिति को पुनः पैदा कर देता है। वो ही जो परिवेशीय अंश दूर भागने लगते हैं, विकर्षणीयता जब बढ़ जाता है, माने परिवेशीय अंशों में, तब वो दूर भागने लगते हैं।वो कहाँ से आता है ,पूछा -परिवेशों से आता है। परिवेशों में तंरगों का, बल का आरोपण, प्रत्यारोपण होती रहती है, उस विधि से परिवेशीय अंश यदि आवेशित हो जाते हैं, विकर्षण की ओर चलते हैं। तब मध्यस्थ बल क्या करता है। उसको स्वभाव गति में आरूढ़ करके अच्छी दूरी में पुनः नियंत्रित कर देता है। इस ढंग से हर परमाणु अपने में नियंत्रित रहना, संरक्षित रहना बताई गई है।
व्यापक में सम्पृक्त रहने के आधार पर ही ये सब अपने अपने में सुव्यवस्थित रह कर संरक्षित रहते हैं।इस बात को बताया -हर परमाणु नियंत्रित रहना, क्रियाशील रहना, घिरे हुए रहने से नियंत्रित, डुबे हुये रहने से क्रियाशील, भीगे हुए रहने से बल सम्पन्न, ये बताया है। वो बल को ही हम मध्यस्थ बल के रूप में पहचानते हैं। सम-विषम बल के रूप में भी पहचानते हैं। ये ठीक है ये पहचान कोई बुरा नहीं है, नाम करण भी कोई बुरा नहीं है, वो अर्थ यदि समझ में आ जाता है। वो अर्थ यदि समझ में नहीं आता तो किसी भी नाम को रखो, वो अर्थ का पता ही नहीं है, सिर कूटी के इलावा क्या होगा! अर्थ समझ में आना चाहिए। परमाणु में होने वाली सम-विषम जो परिस्थितियाँ हैं,क्या हैं? परिवेश में जो अंश रहते हैं, वो मध्यांश के पास आने की एक विन्यास होती है। उसको एक नाम दिया जा सकता है, उसको आकर्षण बल कहा जाए या विषम हो गया, सम हो गया, कुछ भी आप नाम देते रहो। हमको क्या तकलीफ़ है इसमें! और वो यदि दूर भागना है, वो भी एक विन्यास है, वो विन्यास का भी कोई एक नाम दिया जा सकता है, नाम दे दीजिए। इन दोनों को सामान्य बनाने का ताकत मध्यांश में बनी हुई है। आता कहाँ से पूछा? आना-जाना नहीं है, होते ही हैं, होना है, आना नहीं है, भाषा को बदल दीजिए।
प्रश्न : कैसे होता है?
उत्तर : घूर्णन गति के बराबर में मध्यस्थ बल बना ही रहता है, हर अंश में रहता है। वहाँ एक प्रकार से समुहगत हो जाता है। काफी मात्रा से मध्यस्थ बल इकट्ठा रहता है और उसको प्रयोग करते हैं। जीवन परमाणु में एक ही अंश बता रहे हे, सुनो, मध्यस्थ बल, एक ही अंश से ये नियंत्रण के योग्य हो गई। वो कैसे आ गयी उसमें कम्पनात्मक गति plus हो गई। कम्पनात्मक गति के योगफल में कम्पनात्मक गति का सटीक उपयोग यदि कर रहा है, वो एक ही अंश मध्य में रह करके उपयोग करता है,वितरित करता है,संयोजित करता है, नियंत्रित करता है और जीवन परमाणु को एक स्वस्थ व्यवस्था के रूप में नियंत्रित कर रखता है एक अंश। उसमें क्या चीज़ plus होना पड़ा? वो जो वर्तुलात्मक गति से अधिक कम्पनात्मक गति, वो मध्यांश के साथ जुड़कर, वो ही केंद्र से जुड़ा है, जो अनेक कोण सम्पन्न है ये जीवन परमाणु भी, सभी कोण से कंपन होता है,वो केन्द्र से जुड़ा रहता है, खूँटे से बंधी रहती है, पूरा कम्पनात्मक गति खूँटे से बंधी रहती है। किस से? मध्य में रहने वाली एक अंश से जुड़ा रहता है। वो जैसा ऐसा-ऐसा करता है, जैसा करना चाहता है हलाया, वो सारे के साथ वो प्रभाव पड़ जाती है। फलस्वरूप नियंत्रित रहना बनता है।