देखना, सुनना, समझने की विधि से ये निकलता है, शरीर व्यवस्था ही रोग को ठीक करता है, वो शरीर व्यवस्था को बुलंद करने के लिए, प्रोत्साहित करने के लिए, उत्साहित करने के लिए हम दवाई देते हैं। ये हमने पहचाना है।
इसी भांति यदि हम पहले यह धरती जिस कारणों से रोग ग्रस्त हो गया है, क्षतिग्रस्त हो गया है, उसको हम क्षतिग्रस्त कार्यों को बंद कर देने पर संभवतः धरती अपने स्वास्थ्य को सुधार लें। ये एक संभावना बनी हुई हैं। इन संभावना के तहत हम काम कर सकते हैं, इसी को हम पर्यावरण संबंधी समस्या, समाधान कह सकते हैं। क्या समाधान करोगे भई? पहले ईंधन के बारे में नया विकल्प खोज लेना। वो कहाँ है? प्रवाह बल के रूप में बिछा हुआ है। प्रवाह बल को हम यांत्रिक बल के रूप में उपयोग करना, उससे बिजली को तैयार कर लेना, बिजली को इतना तैयार करना की चूल्हें से लेकर लोहा को गलाने तक हो जाए, मिट्टी के बर्तनों को पकाते से लेकर मुर्दे को जलाते तक उपयोग हो जाए। उसके बाद भी जो बिजली शेष रह जाए, सभी प्रकार के यान, वाहनों के उपयोग करने के बाद भी अधिक है, इस समृद्धि का अनुभव किया जाए।
इतना बिजली पैदा किया जाए। इसके लिए पूरा का पूरा व्यवस्था अस्तित्व में रखी हुई है। जैसा ब्रम्हपुत्र नदी है, ब्रम्हपुत्र में कम से कम न्यूनतम पानी जो बहती है और उसके प्रवाह बल को हम यदि यंत्र में 100 kms लम्बाई में विभिन्न तरीके से हम प्रयोग कर लेने पर भारत के लिए जितना बिजली चाहिए - रेल के लिए, मोटर के लिए, गाड़ी के लिए, घोड़े के लिए - पहले कही हुई सारे कर्मों के लिए जितना चाहिए, उससे दस गुना हम पैदा कर सकते हैं। दरिद्रता को हम सामने प्रस्ताव रखने पर कोई आदमी तैयार होगा नहीं, चाहे धरती डूब जाए, मर जाए, कोई परवाह नहीं। तो मनुष्य को समृद्ध होने की विधि से ही आज की आश्वासन, आज का कार्यक्रम, आज का योजना कारगर हो सकता है। मनुष्य को ऊर्जा का संपदा बहुत सारा चाहिए ही चाहिए। इसको उपयोग करना भी चाहिए जिससे कोई बड़ी हानि नहीं है, या पर्यावरण को बिगाड़ने का कोई काम कर नहीं रहा है, उस विधि से ऊर्जा को उत्पादन किया जाए और उपयोग किया जाए। पहले तो काम यही है।
उसके पश्चात दूसरे में तो कुछ काम भी किया है, वो है सूर्य ऊष्मा को ऊर्जा के रूप में हम प्राप्त कर लेना। उसके कुछ उपायों को सोचे हैं, वो बहुत ज्यादा सब के लिए सुलभ नहीं है, ये कमी है ही है, उसको सर्वसुलभता की गति को बना लेना। इससे भी बहुत कुछ आराम मिलता है।
तीसरा विधि यही है, तीसरा ऊर्जा स्त्रोत यही है, जो हर कृषि के साथ, कृषक के साथ, गौपालन की आवश्यकता गौपालन करने से गोबर गैस (gas) का कार्यक्रम, इससे ईंधन की काफी आसार बन जाता है।
ये तीन ऊर्जा विधि बहुत ही समीचीन है।
चौथा विधि यही है, हवा से हमारा आवश्यकता को पूरा करना। हवा के बल को हम pumping set में, उसमें, इसमें, जो हम generator में लगा करके अपना उपयोग कर लेना। ये भी एक चौथा उपाय बनी हुई है।
इन उपायों से हमारा ईंधन का जो कार्यक्रम है, उसको पूरा कर लेना। पहला ये हुई यांत्रिक विधि से होने वाला। उसके बाद आता है किसानों में ये जागृति की आवश्यकता है, हर एक किसान अपने खेत खलिहान में, आंशिक भाग में,