मानव जाति एवं धर्म एक ही है, इस चिंतन का उदय तथा अधिक उत्पादन एवं उपयोग, सदुपयोगपूर्ण व्यवस्था पद्धति की सम्पन्नता ही मानवीयतापूर्ण जीवन में आश्वस्त होने का मुख्य आधार है।
मानवीयता सम्पन्न मानवापेक्षा ही संस्कार एवं व्यवस्था पद्धति का आधार एवं लक्ष्य है। यही धर्मनीति, अर्थनीति एवं राज्यनीति का लक्ष्य है। यही मानव जीवन की समग्र नीति है।
मानव आस्वादन तथा स्वागत पूर्वक ही सम्पूर्ण व्यवहार एवं उत्पादन करता है। तदर्थ ही विचार एवं अध्ययन है।
भौतिक एवं रासायनिक सीमा में आस्वादनापेक्षा तथा चैतन्य क्रिया सीमा में सामाजिक मूल्यापेक्षा प्रसिद्ध है। सामाजिक मूल्यों की स्पष्टता मानवीयता की सीमा में पायी जाती है। यही संभावना है।
मानवीयता के बिना मानव जीवन स्वस्थ, विश्वस्त, आश्वस्त, व्यवस्थित, समाधानित एवं स्वतंत्रित नहीं है।
यांत्रिकता की सीमा में आस्वादन की आवश्यकता, संज्ञानशीलता संवेदनशीलता की सीमा में सामाजिक मूल्यों की आवश्यकताएं तथा कल्पनाएं हैं। यही अनुभव के लिए संभावना बनी रहती है।
स्वंय के लिए जो घटनाएं वेदना के कारण हैं वे ही दूसरों के लिए भी हैं, ऐसी स्वीकृति क्षमता ही संवेदना है। इसके अभाव में मानव जीवन में निहित विशेष मूल्यों का प्रयोजन सिद्ध होना संभव नहीं है। इसी विवशतावश मानव सामाजिक मूल्यों के आचरण, अनुसरण एवं अनुशीलन के लिए बाध्य है।
संचेतना ही मानव की विशेषता है। यही विशेषता समाधान, समन्वयता, तारतम्यता , संतुलन एवं संगीतमयता को पाने का एकमात्र अधिकार है।
प्रेम, वात्सल्य, श्रद्धा, ममता, सम्मान , स्नेह, विश्वास, गौरव एवं कृतज्ञता संज्ञानशीलता का प्रत्यक्ष रूप है। इनके बिना सामाजिक व्यवहार सम्पन्न होना संभव नहीं है।
जड़ (भौतिक रासायनिक) प्रक्रिया में गति एवं चैतन्य क्रिया में संचेतना ही प्रधान अभिव्यक्ति है। चैतन्य क्रिया में कम्पनात्मक गति ही संचेतना एवं वर्तुलात्मक गति ही यांत्रिकता है। इसी