अवसर का भास, आभास या प्रतीति होना मानव में पाये जाने वाले स्वभाव की प्रक्रिया है, जो जागृति की गरिमा है, क्योंकि उनमें अनुभव से अधिक उदय होना पाया जाता है। यही अनुमान भास, आभास एवं प्रतीति है। ये सब चैतन्य क्रिया की सीमा में सम्पन्न होते हैं।
अनुमान यथार्थ एवं अयथार्थ दोनों का होता है क्योंकि भ्रमित मानव ने जो जैसा है, उसके विलोम की स्थिति का अनुमान किया है, जैसे मृग मरीचिका।
प्रत्येक अनुसंधान के मूल में यथार्थता के प्रति अनुमान पाया जाता है, जो स्पष्ट है।
मानव द्वारा प्रकट होने वाला प्रमाण केवल प्रयोग, व्यवहार एवं अनुभव पूर्वक ही सिद्ध हुआ है, जो प्रत्यक्ष है।
प्रयोग सिद्ध प्रमाण उत्पादन व व्यवस्था की सीमा में; व्यवहार सिद्ध प्रमाण समाज की सीमा में एवं अनुभव सिद्ध प्रमाण आचरण की सीमा में उपादेयी तथा प्रयोजन दायी सिद्ध हुआ है।
जीवन प्रमाण सिद्ध करने के लिए ही है। वह उत्पादन, व्यवहार एवं अनुभूति ही है।
प्रमाण विहीन अथवा प्रमाण संभावना विहीनता ही निराशा या कुण्ठा है, जो मानव जीवन के कार्यक्रम में सहायक नहीं हैं।
प्रमाण ही परिचय, समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व, जागृत जीवन, उपलब्धि, सफलता, अखण्ड समाज, विधि, व्यवस्था, सभ्यता , संस्कृति एवं संस्कार है।
प्रमाण सिद्ध एवं सम्पन्न होते तक मानव संतुष्ट नहीं है। प्रमाण सिद्धि पाँचों स्थितियों में मानवीयता तथा अतिमानवीयता की सीमा में है। अमानवीयता की सीमा में यह संभव नहीं है। “तात्रय” से अधिक मानव के लिए प्रयोग, व्यवहार एवं अनुभव करने के लिए कुछ भी नहीं है।
मानव में संस्कार ही विचार एवं आचरण है, यही सम्यकता के लिए अपेक्षा है। संस्कार की सम्यकता के बिना सामाजिकता की अखण्डता, सार्वभौमिकता, तारतम्यता एवं एकसूत्रता संभव नहीं है। यह मानवीयता एवं अतिमानवीयता पूर्वक सफल एवं अमानवीयता की सीमा में असफल है।
वर्ग भेद के निराकरण के लिए मानवीयता एवं मानवीय मूल्य ही मूलत: आधार हैं। इसके बिना वर्ग भेद, समुदाय वाद का अभाव नहीं है एवं युद्ध संभावना से भी मुक्ति नहीं है। युद्ध मानव का अभीष्ट या अभीष्ट साधन नहीं है। सम्पूर्ण वर्गीयता मानवीयता में परिसमाप्त होती हैं।