क्रियाकलाप ही है, यही बौद्धिक अध्ययन है। चैतन्य क्रिया एवं आचरण स्पष्ट किया जा चुका है।
“नियम त्रय” सम्पन्न विचार ही व्यवहार में सामाजिक तथा उत्पादन में सफल हैं।
न्यायपूर्ण जीवन ही सामाजिकता का प्रत्यक्ष रूप है। संबंधों में निहित स्थापित मूल्यों का निर्वाह ही न्यायपूर्ण व्यवहार है।
न्यायपूर्ण विचार ही प्रबुद्धता के रूप में है। न्यायपूर्ण जीवन ही संयत जीवन है, यही अपव्यय एवं भय से मुक्ति है।
अपव्यय एवं भय में सामाजिकता नहीं है।
संबंध और मूल्य
प्रत्येक संबंध में स्थापित एवं शिष्ट मूल्य स्पष्ट व प्रमाणित हैं। जैसे:-
1. माता-पिता के प्रति विश्वास निर्वाह निरंतरता = गौरव, कृतज्ञता, प्रेम, सरलता, सौम्यता, अनन्यता-भावपूर्वक वस्तु व सेवा के समर्पण रूप में है।
2. पुत्र-पुत्री के प्रति विश्वास निर्वाह निरंतरता = ममता, वात्सल्य, प्रेम, सहजता, अनन्यता-भावपूर्वक वस्तु व सेवा के समर्पण रूप में है।
3. भाई-बहन की परस्परता में विश्वास निर्वाह निरंतरता = सम्मान, गौरव, कृतज्ञता, प्रेम, सौहार्द्रता, सरलता, सौजन्यता, स्नेह, अनन्यता-भावपूर्वक वस्तु व सेवा अर्पण के रूप में है।
4. गुरु-शिष्य के प्रति विश्वास निर्वाह निरंतरता = प्रेम, वात्सल्य, ममता, अनन्यता, सहजता, भावपूर्वक प्रबोधन जिज्ञासा पूर्ति सहित वस्तु व सेवा समर्पण के रूप में है।
5. शिष्य-गुरु के प्रति विश्वास निर्वाह निरंतरता = गौरव, कृतज्ञता, प्रेम, सरलता, सौजन्यता, अनन्यता-भावपूर्वक जिज्ञासा सहित वस्तु व सेवा समर्पण के रूप में है।
6. पति-पत्नी की परस्परता में विश्वास निर्वाह निरंतरता = स्नेह, गौरव, सम्मान, प्रेम, निष्ठा, सौहार्द्रता, अनन्यतापूर्वक सद्चरित्रता सहित वस्तु एवं सेवा अर्पण के रूप में है।