ज्ञानावस्था की इकाई में निर्विवाद की आशा आकाँक्षा है। साथ ही उसमें पूर्णता के लिये प्रयास भी साम्यत: पाया जाता है। इसकी अपर्याप्तता ही है, जो प्रभुसत्ता में, से, के लिये विविधता है। यही द्रोह, विद्रोह, आतंक तथा युद्ध है जबकि यह सब मानव की वाँछित (आशित) घटना, स्थिति या परिस्थिति नहीं है।
समृद्धि, समाधान, अभय एवं सहअस्तित्व ही मानव कुल की सार्वभौमिक आकाँक्षा है।
प्रभुसत्ता की प्रतिष्ठा तब तक परिपूर्ण नहीं है जब तक अभयता को प्रदान करने में समर्थ न हो जाए।
प्रभुता ही अभयता, अभयता ही क्रम, क्रम ही जागृति, जागृति ही अनिवार्यता, अनिवार्यता ही प्रबुद्धता, प्रबुद्धता ही जीवन सफलता और जीवन सफलता ही प्रभुता है।
मानवीयता जागृत मानव में होना ही प्रभुसत्ता की प्रतिष्ठा एवं उसकी अक्षुण्णता है।
सत्ता का तात्पर्य जागृति सहज परंपरा से है जो सार्वभौम व्यवस्था रूप में होता है। अमानवीयता में सत्ता का प्रयोग प्रभुता विहीन होता है। इस प्रकार के सत्ता के प्रयोग से प्रभुता का वैभव प्रकट नहीं है। इसी कारणवश वह मानवीयता की शरण के लिए बाध्य है।
अतिमानवीयता में प्रबुद्धता की परिपूर्णतावश सत्ता स्वतंत्रता में समाहित रहती है। फलत: प्रभुसत्ता अक्षुण्ण होती है।
वर्ग विहीन अखण्ड समाज ही प्रबुद्धता का प्रत्यक्ष रूप है।
प्रबुद्धता ही अभ्युदय है। यही शिक्षा का आद्यान्त लक्ष्य है।
मानव ही कारण, सूक्ष्म, स्थूल तथ्यों का अध्ययन करता है।
प्रत्येक मानव में पाये जाने वाले अनुभव के लिये कारण, विचार के लिये सूक्ष्म, व्यवहार के लिये सूक्ष्म-स्थूल तथा उत्पादन के लिये स्थूल तथ्यों का अध्ययन है, जो प्रत्यक्ष है।
अध्ययन से वैचारिक नियंत्रण, शिक्षा से व्यवहारिक नियंत्रण एवं प्रशिक्षण से उत्पादन में नियंत्रण प्रसिद्ध है।
वैचारिक नियंत्रण ही प्रधान उपलब्धि है, यही वैचारिक परिमार्जन संस्कार एवं गुणात्मक परिर्वतन है।
व्यवहार व उत्पादन के लिए विचार ही आधार है। विचार ही सामाजिक एवं असामाजिक है। अध्ययन की चरितार्थता ही स्वयं में, से, के लिए स्पष्ट होना है। वह चैतन्य क्रिया एवं