5. शिष्य - शिक्षार्थी, विद्यार्थी (जिज्ञासु)।
6. स्वामी - इष्ट उपासना में, विशिष्ट व्यवस्था में तथा शिष्ट व्यवहार में है।
मानव मानव से केवल न्याय व सहकारिता की अपेक्षा करता है। भ्रमित मानव वर्गवाद वश ही किसी को न्याय प्रदाय करने में इच्छुक होता है और किसी को नहीं। यही मतभेद असामाजिकता का आद्यान्त कारण है।
भ्रमवश सीमित जनजाति का रूप, बल, पद, धन तथा बुद्धि से गर्वित होना भी वर्ग वाद है।
वर्ग वाद के बिना युद्ध संभव नहीं है।
मानव न्यायपूर्ण आचरण पूर्वक निर्भय व समाधानित है।
प्रत्येक मानव न्यायपूर्ण जीने का इच्छुक है, यही सत्यता सामाजिक अखण्डता का आधार है।
परिवार ही बुनियादी व्यवस्था, न्याय एवं शिक्षा है। प्रत्येक मानव के जीवन जागृति और प्रमाणित होने का आधार भी यही है।
मानव का प्रथम परिचय परिवार में ही स्पष्ट होता है। प्रतिभा एवं व्यक्तित्व का संतुलन व्यवहार में प्रमाणित होता है एवं आचरण प्रकटन का भी परिवार ही बुनियादी क्षेत्र है, उसकी विशेषतानुसार ही विशाल एवं विशालतम सीमा सिद्ध होती है।
धर्म मूलक अध्ययन व धर्मानुगमन योग्य जीवन का कार्यक्रम ही सर्वमंगल है। “जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति में रूप, गुण, स्वभाव के धर्म प्रत्यक्ष न हो ऐसी कोई इकाई नहीं है।” यह प्रमाण रूपानुषंगीय जाति निर्णय पदार्थावस्था में; रूप और गुणानुषंगीय जाति निर्णय प्राणावस्था में; रूप, गुण स्वभावानुषंगीय जाति निर्णय जीवावस्था में; रूप, गुण, स्वभाव एवं धर्मानुषंगीय जाति निर्णय ज्ञानावस्था में पाये जाने वाले प्रत्येक मानव में आवश्यकता के रूप में होना पाया जाता है।
पदार्थावस्था में अस्तित्व धर्म; प्राणावस्था में अस्तित्व सहित पुष्टि धर्म; जीवावस्था में अस्तित्व पुष्टि सहित आशा धर्म एवं ज्ञानावस्था में अस्तित्व पुष्टि आशा सहित सुख धर्म ज्ञातव्य है। यह सब उनमें पायी जाने वाली क्रिया-प्रक्रिया, परिणाम, परिवर्तन, परिमार्जन, प्रयोजन, नियोजन, संयोजन, गठन, संगठन, प्रभाव, प्रसारण, आप्यायन (अध्ययन पूर्वक अपनाया हुआ) तथ्यों के आधार पर है।