आभास सहित आशा ही अभिलाषा है। भास, आभास एवं प्रतीति पूर्वक प्रयास में, से, के लिए संभावनायें प्रत्येक मानव में पाया जाता है।
अनुभव के पहले अनुमान-घटना का होना आवश्यक है। प्रत्येक मानव का प्रत्येक क्षण किसी न किसी घटना या अनुमान सहित है।
अनुमानातीत रूप में जो घटनाएं क्रम से प्रत्यक्ष होती हैं वह आगम क्रिया है। प्रत्येक अनुमान अनुभव पर आधारित अन्यथा अनुभव के लिए सन्निहित है। प्रत्येक अनुमान अनुभव के पूर्वापर में है। अनुमान ही शोधपूर्वक भास, आभास एवं प्रतीति के रूप में उदय होता है। जिसके आधार पर ही मानव में योजना, विचार एवं कल्पना का प्रसव होता है जो अनुभव में प्रमाणित होता है। अध्ययन पूर्ण क्रियाएं स्पष्ट योजना एवं प्रमाणों के रूप में, विचार पूर्ण क्रियाएं योजनात्मक कार्य व्यवहार के रूप में, कल्पनात्मक क्रियाओं की उपादेयता अग्रिम शोघ एवं अनुसंधान के लिए उपयोगी सिद्ध है। यही मानव के उत्थान, प्रगति, सद्गति, विकास, संतुलनपूर्वक सामाजिक जीवन के रूप में प्रत्यक्ष है जो सहअस्तित्व है।
सहअस्तित्व के बिना मानव की प्रगति नहीं है। अपराध व गलतियों के बिना वाद-विवाद, मतभेद, विरोध, आक्रमण, संक्रमण, आतंक, द्रोह-विद्रोह, अविश्वास, निग्रह प्रक्रियायें संभव नहीं है। इन सबके मूल में व्यक्तित्व का संवैधानिक संरक्षण का नहीं होना ही है, यही विद्रोह या समाज से विमुखता है।
व्यक्तित्व को स्थापित करने में व्यक्ति जब असफल होता है तब पराभववश समाज से विमुख होता है, जिसे स्थापित करने के लिए वर्तमान व्यवस्था और पद्धति का विरोध करता है, यही विद्रोह है।
मानवीयता का सम्मान संरक्षण, संवर्धन, प्रोत्साहन एवं आचरण का पालन न होना ही द्रोह, जिससे समाधान पूर्ण व्यवहार सिद्ध नहीं है। फलत: इसका विद्रोह है। यह वाद-विवादात्मक स्थिति अमानवीयता की सीमा में युद्ध परंपरा के रूप में है।
अमानवीयता से मानवीयता पूर्ण जीवन में संक्रमित होने की बाध्यता न्याय की याचना के रूप में प्रत्येक व्यक्ति में अभिव्यक्त है जो दश सोपानीय व्यवस्था में सफल है। न्याय की साम्यता एवं न्याय के ध्रुवीकरण के लिए ही प्रत्येक स्थिति में प्रयास है। व्यक्तिगत रूप में कई व्यक्ति मानवीयता से समृद्ध एवं अतिमानवीयता से परिपूर्ण पाए जाते हैं। साथ ही यह भी देखा जा रहा