स्थापित मूल्यों पर ही समाज संरचना की दृढ़ता स्पष्ट है। यही सत्यता मानव को अमानवीयता से मुक्त होकर मानवीयता से सपंन्न होने के लिए प्रेरित करती है। मानवीयता प्रतीति, अवधारणा पूर्वक सफल है तथा अनुभव पूर्वक पूर्ण और प्रमाण है।
अर्थ ही मूल्य, मूल्य ही अर्थ है। उपयोगिता मूल्य शिष्ट मूल्य में एवं शिष्ट मूल्य स्थापित मूल्य में समर्पित पाया जाता है। यही संयमता का प्रत्यक्ष रूप है।
प्रतिभा और व्यक्तित्व का उद्बोधन प्रबोधन पूर्ण शिक्षा और उसके संरक्षण-संवर्धन योग्य व्यवस्था का अभाव ही अमानवीयता को प्रोत्साहन है। यह विधि व नीति में संदिग्धता, पराभव, विद्रोह, द्रोह, बल प्रयोग व युद्ध है।
जो शास्त्र, साहित्य, ग्रंथ या उपदेश मानवीयता पूर्ण संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था को स्पष्ट करने में असमर्थ रहते हुए भी प्रचार प्रसक्त रहते हैं, वही वर्गीयता और सामुदायिकता के कारण है। यही विविध जाति पंथ का आधार है जो त्रुटि या अपराध है। यही मानसिक रूप में त्रुटि और व्यवहारिक रूप में अपराध का आधार है।
मानवीयता पूर्ण आचरण, व्यक्तित्व एवं व्यवहार में विश्वास न होना ही परिवार तथा व्यक्ति के जीवन में संदिग्धता का होना है। यही अपराध एवं गलतियों का कारण है। जबकि शिक्षा, व्यवस्था एवं स्व-संस्कार का योगफल है, जो प्रत्यक्ष है।
शाश्वत् मूल्यों पर आधारित सामाजिक संरचना का अभाव ही मानव के चारों आयामों एवं दश सोपानीय व्यवस्था में संदिग्धता है। यही अनिश्चयता, सशंकता एवं भय प्रसव की स्तुशि है।
मूल्य दर्शन एवं अनुभव क्षमता ही संस्कार का प्रत्यक्ष रूप है। संस्कार विहीन मानव नहीं है। मानव का संपूर्ण संस्कार “तात्रय” की सीमा में ही प्रत्यक्ष है।
संस्कार परिवर्तन केवल शिक्षा एवं व्यवस्था से ही है क्योंकि त्रुटिपूर्ण शिक्षा व व्यवस्था के द्वारा ज्ञानी-अज्ञानी, विवेकी-अविवेकी, सबल-दुर्बल एवं अन्य किसी को भी संतुष्टि, समाधान व अभय प्रदान करना संभव नहीं हुआ है, जो स्पष्ट है।
स्थापित मूल्य तथा शिष्ट मूल्य का योगफल ही सामाजिक मूल्यवत्ता है। इसी के आधार पर संस्कृति, सभ्यता, विधि एवं व्यवस्था का प्रथम संरचना प्रारूप है एवं संचालन प्रक्रिया भी है।
सामाजिक मूल्यों की स्वीकार क्षमता = संस्कृति