है कि ऐसे व्यक्तियों के परिवार के सभी सदस्य उनके सदृश्य नहीं होते। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि एक व्यक्ति को सजग, सतर्क मान लेने मात्र से परिवार एवं समाज का एक सा होना संभव नहीं हुआ है। जिसकी साक्षी में सामुदायिक विविधता है। फलत: वर्ग एवं युद्ध परंपरा है। अतएव जब तक मानवीयता पूर्ण शिक्षा अखण्ड समाज के अर्थ में सार्वभौम व्यवस्था सर्वसुलभ नहीं होगी, तब तक सर्वशुभ के लिए प्रयोग होना स्वाभाविक है।
सामाजिकता संस्कृति व सभ्यता की व्यवस्था की विविधता जब तक रहेगी तब तक युद्ध के भय का अभाव नहीं है। संस्कृति एवं सभ्यता की एकता मात्र मानवीयता में है। शिष्ट मूल्य सहित स्थापित मूल्य का निर्वाह करना ही मानवीयता का प्रत्यक्ष रूप है, जिसमें व्यक्तित्व समाया रहता है। जिसमें उपयोगिता व कला मूल्य समर्पित होता है उसी के लिए उत्पादन किया जाता है।