वाला सर्वतोमुखी विकास है। यही अभ्युदयशील होने का प्रत्यक्ष लक्षण है। इसलिए “सुख, शांति, संतोष एवं आनंद स्थापित मूल्यों के अनुभव में ही है। पूर्ण मूल्य में अनुभव ही परमानंद है।”
अनुभव की निरंतरता ही परमानंद है। अनुभव स्थापित मूल्य सहअस्तित्व में ही है।
सुन्दरता एवं उपयोगिता मूल्य की स्थिरता नहीं है क्योंकि उपयोगिता एवं सुन्दरता स्वयं में एक सी नहीं है, यह सामयिक है, जिसके साक्ष्य में :-
1. शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंधेन्द्रियों में आवश्यकताएं सामयिक हैं।
2. क्षुधा, पिपासा सामयिक हैं।
3. संपूर्ण उपयोग सामयिक है।
4. महत्वाकाँक्षा, सामान्याकाँक्षा से संबंधित उपयोग सामयिक हैं।
5. विनिमय सामयिक है।
6. वस्तु व सेवा का नियोजन सामयिक है।
इसलिए उपयोगिता व सुंदरता मूल्य सामयिक सिद्ध है।
स्थापित मूल्य, मानव मूल्य, जीवन मूल्य देशकाल से बाधित (सीमित) नहीं है। प्रत्येक संबंध में निहित स्थापित मूल्य निकट व दूर, भूत भविष्य एवं वर्तमान से प्रभावित नहीं है। प्रत्येक स्थापित मूल्य तीनों कालों में एवं सभी देशों में एक सा है।
यह अपरिवर्तनीयता स्वयं में स्पष्ट करती है कि स्थापित मूल्य ही नित्य है, जबकि प्रत्येक इकाई में पाई जाने वाली उपयोगिता एवं सुंदरता का परिणाम व परिवर्तन प्रसिद्ध है।
“मूल्य मात्र अनुभव ही है।” यह जागृति क्रम में पाई जाने वाली चैतन्य क्रिया की क्षमता है।
क्रिया में मूल्यों की स्थिति का अभाव नहीं है। उसे अनुभव करने की क्षमता के अभाव में वह रहस्य अज्ञात एवं अप्राप्त है।
उपयोगिता मूल्यों के आधार पर समाज की स्थायी संरचना संभव नहीं है क्योंकि वह स्वयं में स्थायी नहीं है।