जंगल लगाने की आवश्यकता है। फलदार वृक्ष हो, उपयोगी वृक्ष हो, ऐसे वृक्षों को लगा के रखने की आवश्यकता है ही है। अब जंगल से तो कोई लकड़ी मिलने वाला नहीं है, ये तो थोड़े दिन और भी झूझ ले, उसके बाद तो एकदम नहीं मिलने वाला है, ये तो बात सच्चाई है। इसके लिए अभी से जागृत होने की आवश्यकता है। ये पुनः ईंधन की दूसरा एक स्त्रोत है ये।
उसी के साथ-साथ ये भी एक आवश्यकता है, हर किसान के पास ऐसे भी एक उदारता की आवश्यकता है और जागृति की आवश्यकता है, सचेष्टता की आवश्यकता है, जितना पाताल से हम जल को लेकर के उपयोग करते हैं, उतना ही या उससे ज्यादा पानी खड़ा करने योग्य किनारा, तालाब, कुआँ बना करके रखने की आवश्यकता है।
इस प्रकार की आवश्यकताओं को पहचानने से पुनः ये धरती अपने स्वास्थ्य को प्राप्त कर लेगा। ये सब दवाई है। किस के लिए? धरती अपने रोग को ठीक करने के लिए ये सब दवाईयाँ हैं, और कछु ना होए! हम जो है ना दवाई खाते हैं, गोली बुकनी के रूप में बहुत सारे दवाइयाँ खाए थे और धरती के लिए यही दवाइयाँ हैं। ये दवाई यदि प्रयोग में आने से धरती अपने स्वास्थ्य को सुधारने की प्रयत्न करेगा, ऐसा मेरा विश्वास है। इस पर आप लोगों को भरोसा होना चाहिए, सब को भरोसा होना चाहिए, अपने में एक सम्मिलित चेष्टा की आवश्यकता है। ये पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं को सुधारने के लिए एक बहुत सहज सुंदर होने वाली - ये भी नहीं कि आपको आकाश से कोई तारा उतारना हो - केवल हम हमारे विवेक का प्रयोग करने की बात है, आगत में आने वाले अनिष्ट को पहचानने की बात है, उसके विकराल तक वो मूल्यांकन करने की बात है, उससे बचने के लिए अपने स्वयं प्रवृत्ति को सजग बनाने की बात है। इसको किया जा सकता है। ये पर्यावरण सम्बन्धी जो आज की स्थिति है और उसका उपाय जो है, इस ढंग से छोटा सा स्वरूप में आता है।