किसका, कोई रंग ही नहीं है, हर रंग भद-रंग। कोई ठिकाना विहीन आकार है ये। इस ढंग से मानव जाति आ गए सब, अब क्या करेंगें? अब इसमें क्या हो गई - मनुष्य को मनमानी करने वाली बात आ गई क्योंकि मनुष्य के पास कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता रखा ही है, इसके आधार पर मनमानी करने में आदी हुआ। मनमानी करते-करते पहले भगवान का भय, भगवान से डर भय, गायत्री से डर भय, गुरुजी से डर भय, डर भय से पहले शुरू किया। उसके बाद प्रलोभन में पहुँच गए। अब तो भय से काम नहीं बनेगा तो क्या की जाए? प्रलोभन। गुरुजी ये देही वो देही, देवता ये देही वो देही, यहाँ हम पहुँच गए।
उसके बाद ये भी पूरा नहीं हुआ तो विज्ञान आ गए। क्या कहा वो? गुरुजी नहीं देंगें, देवता नहीं देंगें तो खुद ही हड़प लोगे, ये बताया गया, ये ज़्यादा सुगम लगा। हर पल हड़पन तो वाचा में हम शुरू कर लिए। अभी पूरा का पूरा संसार हड़पन तो वाचा सिद्धांत पर काम करने को तत्पर हो गया है। इसी हड़पने की जगह में जंगल झाड़ी सब को उजाड़ के रख दिया। इसी हड़पन तो वाचा की विधि से खनिज, कोयला, तेल सब को हड़प करके सत्यानाश करके रख दिया। और उसी बीच में कोई अच्छा-अच्छा काम भी हो गई जैसा ये रखा है। इसमें अपने आप शकलों का photo उतार देता है। इस बीच में बोचक[1] करके कोई अच्छे काम भी हो गए। शुरूआत हुआ है कुकर्म के लिए। मोटर-गाड़ी ये सभी विज्ञान की पहला शुरुआत कुकर्म के लिए ही है। आप मानिए! उसके बाद धीरे-धीरे वो कहीं ना कहीं बोचक जाती है।
प्रौद्योगिकी विधि से, प्रलोभन कार्य के लिए, लाभ को उत्पादन करने के लिए, बोचका करके लोगों को लपका दिया। पूरा हो गया बात। इस ढंग से हम कुछ अच्छे चीज़ पा गए। क्या पा गए भई? मोटर-गाड़ी, ये ऐसे अनेक यंत्र। इसको ऐसा कहा जा सकता है दूरश्रवन से, दूरगमन से, दूरदर्शन से सम्बंधित सभी यंत्र उपकरणों को हम पा गए हैं। ये कैसे पा गए? बोचक करके पाया है ये। ये शुरुआत जो सबको सुविधा देने के लिए बात नहीं रहा। सबको शोषण करने के लिए ही रहा। इसके बावजूद ऐसे स्थिति बनी हमको सुविधा के रूप में ये चीज़ उपलब्ध हो गईं। इसको जीवंत बनाए रखना हमसे बनता है। इस ढंग से विज्ञान से कुछ अच्छे काम हुई, कुछ बुरे काम हुई। सबसे बुरे काम धरती के साथ हुई है। धरती को स्वस्थ बनाने की बहुत आवश्यकता है, उसके लिए पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने की आवश्यकता है। उसका जो सार भाग बताया, जो ईंधन की व्यवस्था का विकल्प हम यदि अपनाते हैं, ये धरती पुनः अपने रोग को दूर करने के लिए प्रयत्न करेगा जिससे हम इस धरती पर बहुत ही आश्वासन पूर्वक जी सकेंगें, ऐसा मेरा विश्वास है।
प्रश्न : प्राणावस्था से जीवावस्था से रचना का विकासक्रम?
उत्तर : प्राणावस्था में बताया प्राण कोशा ही सभी रचना किए हैं, ये जो रचना करने वाले क्रम में प्राण कोशाएँ जो हैं अपने में रचना विधि को बदलते रहते हैं। एक प्रकार की रचना करने के बाद संतुष्टि मिलती है, वो संतुष्टि के बाद पुनः और रचना के लिए कोई विधि को अपने में स्वयं स्फूर्त करते हैं। इस ढंग से क्या होता है, दूसरे प्रकार की रचना शुरू हो जाता है। वो कहाँ से शुरू हुई भई? ये जो प्राणावस्था के पत्ति-पतंगड़ जहाँ एकत्रित हुआ वहाँ भुनगी कीड़ा तैयार
बोचक - दायित्व अथवा वचन हीनता ↑