शेष रह जाता है, बाकी एषणाएं गौण हो जाते हैं और सदा-सदा उपकार करने में उनका प्रमाण बनता है, दया पूर्वक कार्य करता है।
दिव्य मानव क्या कर देता है? दिव्य मानव का मतलब ये होता है - पूर्ण जाग्रत रहता है, उसको कोई लोकेषणा भी नहीं रह जाता है। वो अपने जागृति को प्रमाणित करने के लिए मानव परम्परा में सतत काम करता रहता है और उसका सिद्धांत ये है -सुखी बना करके सुखी रहना बनता है, ये सिद्धांत है, उसको प्रमाणित कर देता है। इतनी ही बात है, छोटा सा काम! हम दूसरों को जीने देकर जीते हैं, ये दिव्य मानव का काम है। सुखी बनाकर जो सुखी होते हैं, इसीलिए दिव्य मानव समाधानित करके समाधान को प्रमाणित करते हैं। ये दिव्य मानव का काम प्रमाणित हो करके प्रमाणित रहते हैं ये दिव्य मानव का काम है। इस प्रकार की छोटा सा काम करता है दिव्य मानव। ठीक है? और पशु मानव राक्षस मानव सारे बड़े-बड़े काम कर डाले हैं। ये काहे का मतलब है? मतलब इत्ते है! तो इस ढंग से बिलकुल एक धारा प्रवाह, सुखद धारा बह रही है।
अभी जो है ना मानव परम्परा भ्रमित परम्परा को ही पाल रखा था। उसमें हम एक बार चिंतित हुए, या पीड़ित हुए, उसको हम खोजने के लिए शुरू किया। उसको जाग्रत मानव के पद में हम अपने को आरूढ़ किया, प्रतिष्ठित किया, प्रमाणित किया, उसके पश्चात बाक़ी लोग भी जागृत हो सकते हैं, उसके लिए हम शुरुआत किया। शुरुआत क्या कर दिया भाई पूछा? तो मनुष्य में विश्वास पैदा करने के लिए जीवन विद्या कार्यक्रम लाए, मानव परम्परा में मानवीयता को स्थापित करने के लिए शिक्षा का मानवीयकरण योजना को तैयार कर लिए हैं और उसको भी प्रमाणित करने के क्रम में हम हैं और उसके बाद सर्वमानव एक अखण्ड समाज सार्वभौम व्यवस्था के रूप में प्रमाणित होने के लिए परिवार मूलक स्वराज्य व्यवस्था योजना को अलग लागू करने के लिए तैयारी किए हैं। हरी हर, छोटा सा काम!
व्यापक वस्तु है, व्यापक वस्तु में प्रकृति अनंत इकाइयों के रूप में हैं। ये सभी का सभी चार अवस्था में हैं। ज्ञानावस्था की इकाई दो भाग में है - भ्रमित और जागृत। अभी हम जागृति के पक्ष में काम करने के लिए हम तन, मन, धन को लगाए पड़े हैं, ये हमारा काम है। हमको इसमें सुख है, प्रसन्नता है और सफल होने से भी प्रसन्नता है, असफल होने में भी हम प्रसन्न हैं। जैसा हम प्रयत्न करते हैं कि यहाँ एक बढ़िया स्कूल हो जाए, मानवीय शिक्षा यहाँ हो जाए, ऐसा हम चाहते हैं। तो यहाँ रहने वाली ये बैठी है। ये नहीं भी चाहती है, नहीं भी कर पाती है, हम तभी भी इनसे प्रसन्न रहते हैं। ये कर भी लेते हैं, कहने के लिए सोने पर सुगंधी हो गई। पहले से प्रसन्न, और प्रसन्न। ये ही सब जगह में, सर्व देश काल में हमारा संबंध ऐसे है। हम सफलता के स्थिति में भी हम प्रसन्न रहते हैं, विफलता के समय में भी हम प्रसन्न रहते हैं। तो आज इस देश काल में आप नकारते हैं, आगे की देश काल में आप स्वयं सकारेंगें। इस विधि से हम चल रहें हैं।
प्रश्न : बाबा जैसे जागृति का कार्यक्रम बहुत जल्दी नहीं हो पाता है, इसके बाद भी आपकी प्रसन्नता में फ़र्क़ नहीं पड़ता?
उत्तर : उस आधार पर है, आपको सुख स्वीकृत है, सहमति है, आपमें, मुझमें, जो नकारने वाले, सकारने वाले, सबमें शुभ की स्वीकृति है, सहमति है। ज़िम्मेवारी नहीं है। इस ढंग से हम खुश हैं। आज ज़िम्मेवारी नहीं है, कल हो जाएगा। इसमें क्या तकलीफ़ है, बताओ? ये भी नहीं है सभी ग़ैर ज़िम्मेवार होंगें, ऐसा भी बात नहीं है। कोई ना कोई