जो है, आदमी को भ्रमित करने के लिए ही शिक्षा है, आदमी को जागृत करने की शिक्षा नहीं हैं। ये इसका समीक्षा हो पाता है। इसीलिए जागृत शिक्षा को स्थापित कर लिया जाए, इसका उपाय यही है। जागृत शिक्षा का मतलब ही होता है, मानवीय शिक्षा। मानवीय शिक्षा का मतलब है, व्यवस्था में जीने वाला शिक्षा। व्यवस्था में जीते हैं, तो तब वो उत्पादन कार्य योजना लागू होता है।
तो वो परिवारगत आवश्यकता के आधार, क्या उत्पादन करना, कितना उत्पादन करना और कितना उत्पादन करना वो मात्रा तय करने के लिए परिवार के अलावा दूसरा कोई आधार बनता नहीं। एक व्यक्ति में कोई उत्पादन का आवश्यकता की आधार कोई भी quantify नहीं होता है, उसका मात्रा निर्धारित होता नहीं है और कम से कम यदि कोई चीज़ है,वो परिवार है। परिवार में ही हमारा आवश्यकता निर्धारित होता है, आवश्यकता निर्धारित होने के पश्चात उससे अधिक हम उत्पादन करने योग्य हर व्यक्ति रहते हैं। कैसे रहते हैं? हर व्यक्ति परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने योग्य रहते हैं, इसीलिए उत्पादन अधिक करना संभावित है और कम से कम परिवार में 2 व्यक्ति, 3 व्यक्ति उत्पादन करने योग्य रहते ही हैं। इसलिये उत्पादन भरपूर होने की व्यवस्था बनी हुई है। इस ढंग से हम हमारे विपन्नता से मुक्त, संपन्नता से जीने की दिन उदय हो सकता है।
किस आधार पर? समझदारी के आधार पर, मानवीय शिक्षा के आधार पर। दानवीय पाशवीय शिक्षा को छोड़ने पर, व्यापार शिक्षा को छोड़ने पर, लाभोन्मादी शिक्षा को छाड़ने पर, कामोन्मादी मनोविज्ञान को छोड़ने पर और भोगोन्मादी समाज योजनाओं को छोड़ने पर। आदमी ये मानवीय शिक्षा को ग्रहण करने पर, आदमी समझदार होता है, समझदारी के आधार पर उत्पादन कार्य योजना को समृद्धी के अर्थ में योजित कर पाता है, नियोजित कर पाता है, संप्राप्ति को प्राप्त कर सुखी हो पाता है।