लिए अपना आश्वासन देता है। जो कुछ भी उनका सत्य को बताने के लिए आधार है, प्रमाण है, वो यंत्र है। यंत्रों से जो कुछ भी result निकलती है, परिणाम निकलती है, उसको अंतिम सत्य नहीं मानना है। ये विज्ञान की शुरुआत की स्थिति है, आज की स्थिति। यंत्रों से जो कुछ भी परिणाम निकली उसको अंतिम सत्य नहीं मानना। इस ढंग से आगे उसको और कोई यंत्र बनाने के लिए सोचना, और कोई प्रयोजन निकालने के लिए सोचना, इस ढंग से परंपरा बनाने की बात कहते है। उसमें मूलभूत यही प्रश्न उद्भूत होता है - क्या परम सत्य, अंतिम सत्य को विज्ञान संसार समझा है? जिसको खोजते चला है? ये आता है। यदि नहीं समझा है, तब अंतिम सत्य, प्रथम सत्य क्या होगा? इसको कौन बताएगा? ये बात तो प्रश्न चिन्ह में आ जाता है।
जैसा अद्वैत वादियों का मोक्ष की बात है। ठीक है ना? तो मोक्ष के बारे में गवाही कौन देगा? उसके लिए उत्तर दिया है हमारे यहाँ - तो जो नमक की पुतली समुद्र को नापने गया तो क्या हो गया वो? समुद्र में गल गया। मैंने बोला, काठ की पुतली होगा तो क्या होगा? तैरेगा। तैरेगा तो नापेगा। तो क्या जब नामक का पुतली नाप सकता है तो काठ का पुतली क्यों नहीं नापेगा भाई? (नहीं, नमक का पुतली नहीं नाप सकता है) अच्छा ये काठ का पुतली नापेगा। तो आप हमारा कल्पना की दौड़ में कुछ भी हम कह लें ये एक अलग चीज़ है। उसके लिए अपन कह ही रहे हैं प्रतीक प्राप्ति होने वाला नहीं है। उपमा उपलब्धि होगी नहीं। ना उपमा उपलब्ध हो सकता है, प्रतीक ना प्राप्ति हो सकता है। ये तो हो गए उस विधा के लिए पूरा काम। और इस विधा के लिए, विज्ञान विधा के लिए, यही आती है तो विज्ञान क्या सत्य को समझ करके प्रयोग कर रहा है? सत्य को ना समझ करके सत्य को खोज रहा है, इसको सोचने की बात आता है। हर जगह में यही बात होती है, यही कहा अंतिम सत्य नहीं है। हर यंत्रों से उपलब्धि को यही कहा जाता है।
ये तो बात सच्चाई है। ये तो हमारा समीक्षा की स्वरूपित निकली। इसमें हमारा कोई आरोप नहीं है - अपने वो कर दिया, ये कर दिया। आप जो कर दिया वो इतिहास रखा ही है। अंततोगत्वा क्या है विज्ञान से हमको कोई दिशा या लक्ष्य निर्धारण करने में हमारा कोई सहायता हुई नहीं है। सुविधाओं में बहुत सारी चीज़ उपलब्ध हो गई, वो निर्धारित रूप में महत्वकांशा रूपी सुविधाएं हमको उपलब्ध हुआ है। उसके लिए हम कृतज्ञ हैं ही। ठीक है? हरिहर। इसके अलावा और कुछ हुआ नहीं।
प्रश्न : इस संदर्भ में द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की समीक्षा और समाधानात्मक भौतिकवाद का प्रतिपादन, ये मुझे लगता है की विज्ञान की संदर्भ में आवश्यक है।
उत्तर : हाँ देखिए, उस में ये बहुत बड़ी भारी मुद्दा यही बनाता है, तो जो कोई भी दो ग्रह, जैसा की ये धरती घूम रहा है। धरती जो है ना दूसरे कोई धरती से, सूर्य से या कोई और ग्रहगोल से खींचातानी वश सब घूम रहा है। ऐसा इनका सोचना है। हमारा सोचना ये है व्यवस्था में भागीदारी कर रहा है। दोनों में कितना दूर है आप ही सोच लो? समाधानात्मक भौतिकवाद में ये हम कह रहे हैं ये दोनों अपने व्यवस्था को प्रमाणित करने के लिए स्वयं स्फूर्त विधि से काम कर रहे हैं। और धरती अपने को स्वयं व्यवस्था और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने की क्रम में काम कर रहे हैं, ऐसा समाधानात्मक भौतिकवाद कहता है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ये कहता है ये दूसरे ग्रह के खींचातानी से ये अपने को बचाव के लिए पागल हो करके घूमता रहता है, ऐसा वो बोलते हैं।