प्रदूषण में आदमी जियेगा, ऐसा एक रेखा बनायेंगें। रेखा बनाने के बाद, थोड़ा दिन के बाद, वो रेखा पार हो जाता है। क्या चीज़? प्रदूषण।
उसके बाद आगे की रेखा बनाओगे। ये कब तक बनाओगे? आपके घुटकी में साँस चलता रहता है, तब तक करोगे। जब तक साँस चलता रहेगा, तब तक ये रेखाएँ बदलती रहेंगीं, तब तक आप रेखाएँ बनाते रहेंगें, तब तक हम सुनतें रहेंगें। इसमें निराकरण क्या हुआ? किसके पास निराकरण पहुँचा? कैसा पहुँचा? अध्ययन में क्या चीज़ निराकरण आई? तो standard के नाम से आप अपना पैसा भँजाने के लिए रेखा बनाते हैं, तो रेखाएँ जो है पैसा दिये बिना आप रेखाएँ भी नहीं बनाते हैं - इतने अच्छे उदार चित्त हैं! इन विधि से पैसा के against में आप ऐसा रेखा बनाया जो कि आज जहाँ तक प्रदूषण में जी सकता है आदमी। कल उसको बदलेंगे, परसों और बदलेंगे, तरसों ऐसा बदलेंगे।
जब तक आप हम दोनों समाप्त न हो जायें, घुटकी से प्राण निकल ना जाए, तब तक आप रेखाएं बनाते रहेंगे, ऐसा मेरा सोचना है। बात यहाँ आ करके टिकता है। इससे कोई प्रदूषण विधि का कोई सही सलामत विधि तो नहीं निकला। उसके बारे में हमारे सहअस्तित्वादी विधि से यदि हम सोचते हैं, तब यह निकलता है, मनुष्य अपने पद प्रतिष्ठा को पहचान ले। उस पर विश्वास करे। ऐसे पद प्रतिष्ठा - क्या पद - मानव जो है ना ज्ञान अवस्था की इकाई है। देव मानव पद में मानव है, गण्य, और भ्रमित रहने से पशु मानव राक्षस मानव के रूप में काम करता है। ज्ञानावस्था का प्रतिष्ठा देव मानव पद ही है। देव मानव का मतलब ये होता है - जो आदिकाल से हम बहुत कुछ, और कुछ अच्छे-अच्छे शब्द प्रयोग किए हैं - प्रबुद्धता का नाम दिया है। प्रबुद्धता एक ज्ञानावस्था की, देव पद प्रतिष्ठा की, एक वैभव है। क्या हुआ? समझदारी - ठीक है? ज्ञान पद प्रतिष्ठा की एक वैभव है।
समझदारी के बारे में अभी आपसे चर्चा हो चुकी है, अस्तित्व को पूरा समझने से समझदारी है, दूसरा मानव को पूरा समझने से समझदारी है। पूरा का मतलब - जीवन और शरीर - दोनों को समझने से। मानव मानव को समझा गया - ये समझदारी है, और इसका प्रमाण व्यवहार में आता है - उसका नाम है मानवीयता पूर्ण आचरण। उसका जो कसौटी है - व्यवस्था के रूप में प्रमाणित होना है - इस ढंग से बनी हुई है। ये कहाँ से जुड़ गया? प्रत्येक एक अस्तित्व में अपने त्व सहित व्यवस्था के रूप में है, समग्र व्यवस्था में भागीदारी करता है - इस सूत्र के साथ जुड़ने के लिए इतना कसरत मानव जाति को करना बाकी है दिखती है। अभी तक इस ओर कोई कसरत हुई नहीं है। जीवन को समझने के लिए कोई कसरत समझ में नहीं आई है आदमी को, या मानव को समझने में कोई कसरत समझ में नहीं आई है। अंत में प्रौद्योगिकी विधि से यही सोचा गया है - प्रौद्योगिकी व्यवस्थावादी, यही सोचते हैं - मानव का management कठिन है, यंत्र का management ठीक है।
ये control रहता है - यंत्र से management control में रहता है, मानव का management कठिन है, इसको कर नहीं सकते। इसी के आधार पर जितने भी जो उत्पादन कार्य हैं, इसको हम यंत्रीकरण किया, इस विधि से कि हमारा management के लिए सुगम हो जाये। उतने जितने में यंत्र बनाया, उतने ही आदमी बेकार हो गया, और दुष्ट कर्म में प्रवृत्त हुआ, और सत्कर्म के लिए आपके पास कोई रास्ता देने की था नहीं। जितने भी हमारे