अर्वाचीन[1] समय की सत्कर्म की बात करते हैं - ना तो वो परिवार बन पाते हैं, ना व्यवस्था बन पाते हैं। इसमें गिर पड़ते हैं - सब बेहोश हो करके गिर पड़ते हैं। ना परिवार को प्रमाणित कर पाते हैं, ना समाज को, ना व्यवस्था को। ये तो पहले से ही गिर पड़े हैं। ये जो प्रद्योगिकी व्यवस्था को ला करके हम आदमी को इस ढंग से बेहोश कर दिया।
आदमी जाये कहाँ? तो यदि सब बात के लिए आप यंत्र बना लिए, उसके बाद में आदमी क्या करेगा? क्या करता रहेगा? उसको भी एक बार सोचना है। उसके लिए कुछ देशों ने ये सोचा - मौज मस्ती मारें। मौज मस्ती के बारे में क्या सोचा गया? बहुभोग, अतिभोग को ये मौज-मस्ती माना है। इसको भी यदि अपन ज्यादा से ज्यादा सोचें, यौन संवेदना में दिन भर मगन रहे - इसी को मौज-मस्ती मानने का आधार माना। उसके लिए गाड़ी चाहिए, घोड़ा चाहिए, पोशाक चाहिए, जूता चाहिए, चप्पल चाहिए, तलवार चाहिए, बन्दूक चाहिए - वो सब हम-आप ने बना के ही दिया है। ठीक है? इसमें जब कभी पराभवित होता है आदमी, बढ़िया आत्महत्या की pills खा लेता है, बढ़िया सो जाता है। उसको ले जाकर सरकार दफना देता है। इस प्रकार की बातें देखने को मिल रहा है धरती की छाती पर। इसी धरती की छाती पर भला, ये सब चीज़ें देखने को मिल रहा है।
तो इस ढंग से हम कहाँ पहुँचेंगे, कहाँ पहुँचायेंगे - ये सवाल यहीं आता है। तो कहाँ पहुँचेंगे, कहाँ पहुँचायेंगे वाला सवाल आता है - अपन पुनः वहीं आते हैं - अपने को इस विधि से कुछ मिलता नहीं। यही आता है। जूछापन- मतलब बहुत दुधारू मान करके गाय लाये, पता चला एक बूँद दूध ही नहीं निकला। विज्ञान को इतना बड़ी भारी दुधारू माना, संसार ने इतना सारा अरमान रखा, विश्वास रखा - इससे सारा मानव जाति तर जायेगा। उसके पहले आदर्शवादी विधि से मानव तर जायेगा, इस बात के आश्वासन पहले से देते आ ही रहे हैं। वो गिर पड़े तो ये तैयार ही गए। इसके ऊपर विश्वास रखे, अब कहते हैं तुम इतना pollution में जियोगे, आज एक रेखा लगाया, कल दूसरा रेखा लगा दिया। अब कोई-कोई देश ये भी करता है - मिलावट के बारे में - इतना adulteration १५% वैध[2] है, उससे ज्यादा होने से वैध नहीं है। ये भी कानून बनाये हैं। तो इसका मतलब है प्रदूषण में जीना ज़रूरी है और मिलावट खाना खाकर जीना ज़रूरी है - दोनों चीज़ आ गई।
तो उसके बाद आता है रिश्वतखोरी। रिश्वतखोरी में भी ऐसे सुनने में आया है, सरकारी बयानों में, सरकार में या प्रधान प्रतिष्ठा संपन्न पदों में आसीन व्यक्तियों से ये सुनने में आया है - १५% की रिश्वतखोरी अच्छी है, उससे ज्यादा होने से ख़राब है। ऐसा भी सुनाने में आया है। अब लीजिए - रिश्वतखोरी में भी आप गुंजाइश निकाल लीजिये। आज १५% वैध है, कल जो है ना ५०% होगी, तरसों cent percent होगी। वैसे ही मिलावट में भी वैसी कथा है। आज जो है न १५% मिलावट वैध है और कल २५% होगा, उसके बाद ५०% होगा, उसके बाद पूरा प्रतिशत होगा। कहाँ जाएँगें? और pollution में जीने के लिए भी वैसे ही- आज एक रेखा, उसके बाद ऊपर की रेखा, उसके बाद ऊपर ऊपर ऊपर और ध्वस्त ना हो जाए, तब तक रेखा लगाना। इन तीनों विधा से देखने पर हमको कहीं भी कोई बात नहीं।