छेड़ो। क्या चीज़ है भाई? सारे कौमिओं को मारो तो एक ही कौमी रहेगा, ऐसा वो कह रहे हैं। यही है संघर्षात्मक जनवाद या द्वन्दात्मक भौतिकवाद यही है। अब उनके लिए लिखा, समाधानात्मक भौतिकवाद। संम्पूर्ण भौतिक पदार्थ व्यवस्था में है, और मानव भी व्यवस्था में हो सकता है। संघर्षात्मक जनवाद, संघर्ष करने की जरूरत नहीं है, आवश्यकता से अधिक उत्पादन करना, मस्ती से समृद्धि का अनुभव करना। ये चाहिए, वो चाहिए सोच लो। मस्त जो है ना आवश्यकता से अधिक उत्पादन किया और ठसके से जीया और 10 व्यक्तियों का उपकार किया। ये ठीक है, 10 व्यक्ति का जेब काटना?
व्यापकता को हम अनुभव किया, आप अनुभव करोगे, व्यापकता रहस्य नहीं है, अस्तित्व में कोई रहस्य नहीं है, इतना ही अनुभवात्मक अध्ययत्मवाद का essence point है। अब इसमें कौन सा बड़ी भारी पसीना बहाना है, अनुभव ना करें? रहस्य को कब तक पूजा करें? इतना क्षत-विक्षत हो गये हैं उसके बाद भी हठ धार्मिता को करेंगे और क्षत विक्षत ही होगें, परिणाम ही उसका वोही है।
(सहअस्तित्व को लक्ष्य के रूप देख लेना ये विवेक है) यही आवश्यकता है, अस्तित्व जो है ना बिल्कुल नित्य वर्तमान, प्रकाशमान, विद्यमान और प्रमाण है, वर्तमान रूप में। वर्तमान में जब प्रमाण है, तो वो कौन सा रहस्य है भाई? व्यापक वस्तु जितना सुलभ रूप में हर व्यक्ति को समझ में आता है, एक-एक वस्तु उतना सुलभ रूप में समझ में नही आएगा। अब व्यापक वस्तु को सर्वाधिक गहन, दुरूह, रहस्य बना करके करोड़ों अरबों आदमियों को गन्ने के कोल्हू में डालकर के पेर डाला। सब आदमी खाद-गोबर हो गया भाई। करोड़ों आदमी खाद-गोबर हो गया। हमारा परिवार में सैकड़ों आदमी खाद गोबर हुआ। जिसका इतिहास के लिए हम स्वयं साक्षी हैं। तो इस विधि से आदमी सार्थक होने वाले विधि को अपनाने की आवश्यकता है, उसी विधि में ये आया, अनुभवात्मक आध्यात्मवाद।
अस्तित्व कोई रहस्य नहीं है, अस्तित्व हमको भी समझ में आया है, आपको भी समझ में आयेगा। इसलिए रहस्य नहीं है, यदि हमको समझ में आया आपको समझ में नहीं आता है, तो रहस्य ही रहस्य है। इस ढंग से रहस्य से मुक्ति पाने की बात आ गये। अस्तित्व में न सिद्धि है, ना चमत्कार है। अस्तित्व में जो कुछ भी है, एक निश्चित प्रणाली है, निश्चित परिणाम है, निश्चित फल है। निश्चित प्रणाली, पद्धति के अनुसार हमारा अध्ययन, अध्ययन करना आवश्यक है, क्योंकि मनुष्य समझदारी मूलक विधि से ही जीने योग्य इकाई है, इसलिए इसका नाम ज्ञानावस्था की इकाई नाम दिया। अध्यात्मवादी इसको ज्ञानावस्था की इकाई नाम दिए हैं? जीव नाम दिये हैं और भौतिक वादी भी आदमी को जीव ही कहा है, rational animal, वो ऐसा नाम देते हैं, आदमी जात को। ये सब बातें आपके सामने दुकान रची हुई है। तो रहस्य में जीना है या यथार्थता के साथ जीना है, पहले आप-हमको एक निर्णय लेने की आवश्यकता है।
रहस्य में जीना है, तो पहले किताब प्रमाण वो सही है, उसी में जिया जाए, कोई आपत्ति नहीं है। यदि किताब प्रमाण के अनुसार रहस्य में जीना दूभर हो गई है और उसके बाद यथार्थता के साथ जीया जाए ठसके से, क्या बुरा है इसमें। यदि थके नहीं हैं, और रहस्य में जीया जाए, देखा जाए, किसको क्या तकलीफ है! तो हमारे अनुसार रहस्य जो है, सुख, शांति, अमन-चैन का आधार नहीं है। सिद्धि चमत्कार आदमी को अमन-चैन, जान-माल की सुरक्षा करने में