प्रश्न : अभी जैसे बात हुई मनुष्य शरीर मे कोई जगह सुन्न हो जाता है, सुन्न होना एक तो ये हो सकता है, कि कोशिकाएँ ही खराब हो गई हों, जिसके कारण सुन्न हो गया, या दूसरा ऐसा भी कारण हो सकता है, कि कोशिकाएँ ठीक हैं लेकिन जीवन उस जगह को जीवंत नहीं बना पा रहा है?
उत्तर : ऐसा कुछ नहीं। कोशा सप्राणित रहेगा तो जीवंत बनाए रखना, जीवन से बन जाता है। कोशिका को सप्राणित रहना आवश्यक है, तभी जीवन कोशाओं को जीवंत बना के रखता है। जीवंत बना के रखने का मतलब ये है शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धेन्द्रियों की ग्राहिता, वो इस पूरे रचना में बना रहता है। कुल मिला कर के ये ही है।
प्रश्न : सप्राणित प्राणकोशाओं में भी शब्द का, स्पर्श का, गंध का प्रभाव पड़ता है?
उत्तर : प्रभाव पड़ना अलग है, स्वीकारना अलग है, प्रभाव तो हवा का प्रभाव आपके ऊपर रहता ही है। सारे हवा का प्रभाव को हम नाक से जितना लेते हैं, उतना ही हमारा उपयोगिता है, स्वीकारना उतना ही है। कैसा है बढ़िया? बढ़िया है ना, बढ़िया हो गया। हमारे पास अनुपातीक व्यवस्था है, मनुष्य के पास। किस आधार पर? जीवंत रहने के आधार पर। इनके पास अनुपातीय व्यवस्था नहीं है। तो हवा आयेगा, पूरा हवा झाड़ पर प्रभाव डालेगा ही। और मनुष्य के पास क्या है, पूरा हवा से कितना हवा हमको चाहिए वैसा वो control कर लेता है, घर बना लेता है, गुफा बना लेता है येन कर लेता है तीन कर लेता है, पचास कर लेता है।
प्रश्न : बाबा यदि शरीर के किसी एक भाग को अपन खूब गर्मी देंगे, तो वो तो पूरा का पूरा स्वीकार करेगा?
उत्तर : जब तक वो जीवन उसको बनाए रखने के लिए तत्पर रहता है, उससे ज्यादा यदि आप जला दोगे, छोड़ देता है, उतने को छोड़ देता है या पूरे शरीर को जला दोगे, जीवन शरीर को छोड़ देगा। ये तो देखते ही हो, कई लोगों को आग लगाते हैं, कोई-कोई बच भी जाते हैं, क्यों बचते हैं? जीवन उसको बचाने की इच्छुक रहता है, इसलिए बच लेता है। जब जीवन ये मान लेता है कि इसको बचाया नहीं जा सकता, शरीर ही छोड़ा, भाग गए, उसके बाद कहाँ से बचाओगे। ये तो रोजमर्रा की आई हुई गवाहियाँ हैं, हजारों गवाहियाँ, करोड़ों गवाहियाँ हैं इसका। तो इस ढंग से हम एक अच्छे ढंग से इसको सजा सकते हैं। उस ओर ध्यान ना दें तो आपकी उदारता है। उसको कोई कहने नहीं आएगा, आपको जो है ना घुटी पिलाने कोई नहीं आएगा। आपकी आवश्यकता है, आप स्वयं अपने को लगाना पड़ेगा, इसको विवेचना कर लेना पड़ेगा, इसमें विश्वास रखना पड़ेगा, यथास्थिति से, आपका मनगढ़ंत विवेचना से आपका कोई कल्याण होने वाला नहीं है। वस्तु जैसा है, वस्तु को वैसा ही विवेचना करिये। ठीक है। तो जीवन शरीर को चलाने के लिए, कोई भी रचना चलाने के लिए मेधस तंत्र की आवश्यकता है, जबकि झाड़ जाति में कहीं भी मेधस तंत्र नहीं है। हम कहते हैं कि झाड़ में जीवन होता है। हम कहते हैं तो, हविस पूरा कर लो ना भाई, वैसा ही तुम भी हो, ये भी है, मैं भी हूँ, चलो आगे, आप हम को भी काटने दो, चुल्हे में डालने दो। क्या बात है ये? मनुष्य की सूझबूझ से ही मनुष्य अपने में बहुत सारे परेशानियों को ओढ़ा रहता है, चादर बनाके। अपने ही कल्पनाओं से, ठीक है। उसका क्या परिहार है भाई? उसको अपन भ्रम नाम दिया। भ्रम नाम देने के पश्चात उसका परिहार कैसा करोगे पूछा? तो जैसा है वैसा अध्ययन करो। कहे के लिए चक-पक करें। जैसे- पानी प्यास बुझाता है ये पता लग गया, ठीक है ना, पानी को ऐसे ही समझे रहो। ठीक है ना। और पानी में क्या होता है? पूछा जाये तो उसको यदि विश्लेषण, संश्लेषण करने जाओगे, वो तो आपको और भरोसा दिला देगा, ये प्यास बुझाने की योग्य है। पहले उसका प्रयोजन