को पकड़ करके, प्रक्रिया को पहचानना, प्रक्रिया से प्रयोजनों को पहचानना। दो विधि से अध्ययन हो सकता है। किसी भी वस्तु का प्रयोजन को सहअस्तित्व विधि से, समाधान विधि से, समृद्धि विधि से, अभयता की विधि से आप पहले पहचानिए। वांछित इतना ही है। इसके अलावा कोई चीज़ आपके लिए वांछित वस्तु नहीं है।
इस सूत्रों से हर वस्तु को प्रयोजन के रूप में पहचानिए। पहचानने के बाद उसका विश्लेषण, संश्लेषण, खण्ड, विखण्डन जो कुछ भी करना है करिए, आप को संबोध होगा। प्रयोजन को पहचाने बिना ही काट-कूट दिए तो क्या होगा भाई? जैसा- बच्चों के हाथ में कोई खिलौना दिया, फूल दिया, उसको ऐसा-वैसा नोच-नाच कर के रख दिया, क्यों? उसका प्रयोजन को पहचानते नहीं हैं, नोच-नाच के रख दिया, खतम हो गया, ठीक है ना। तो वही प्रयोजन को यदि, फूल का प्रयोजन को यदि पहचानोगे, तब क्या करोगे, फूल ज्यादा समय तक उस प्रयोजन से सम्पन्न रहे, ऐसा कोई व्यवस्था करेंगें। उसका प्रमाण ये (गुलदस्ता) रखा है। कैसा रखा है? आप ही रखा है। ठीक है ये बात। इसमें जो शोभा है, हमको ये व्यजिंत होते रहे, ये इस फूल की हमारे बीच की संबंध है। उसके लिए ज्यादा देर रहने योग्य आपने बना लिए। ठीक है ये? तो प्रयोजनों को पहचानने के बाद ही विश्लेषण, संश्लेषण किया जाए। किन बातों में? हम नहीं जानते हैं उन चीज़ों को। मैं जो जिस चीज़ को जान लिया हूँ, विश्लेषण पूर्वक, उसको वैसा ही समझा जाए, उसका प्रयोजनों को समझा जाए, तब वो पूरा हुआ। हम विश्लेषण करें, प्रयोजन को हम समझे नहीं हैं, वो क्या हो गया? ‘‘नीम हकीम खतरे जान”।
प्रश्न : कंपन प्रदत्त तरंग से ज्ञान का उद्घाटन होता है?
उत्तर : कैसा हुआ ये, ये क्या हुआ, कैसा हुआ, इसका नेत्र में आने से, स्पर्श में आने से, गंध में आने से, मस्तिष्क में, मेधस तंत्र में इसका संकेत पहुँचता है। वहाँ एक तरंग पैदा होता है, वो तरंग से ज्ञान अर्जन होता है। (ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से) ज्ञानार्जन होता है, जीवन को, ठीक है, एक ये हुई। उसके बाद वही ज्ञानार्जन को जीवन, मेधस तंत्र में प्रसारित करता है, तब ज्ञान प्रमाणित होता है।
प्रश्न : ये गति प्रदत्त तरंग से क्रिया का संपादन हो गया?
उत्तर : हाँ, क्रिया का संपादन होता है और ज्ञानोदय जो होता है, वो मेधस तंत्र के द्वारा जीवन सुनने से वो ज्ञानोदय हो जाता है।
प्रश्न : बाबा ये ज्ञान तो नहीं है, बल्कि ये पहचानना होगा?
उत्तर : ठीक है ना। जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना, ज्ञान का चार पैर। उसमे से एक पैर आपको समझ में आता है तो, बाकि के तीनों को खोजोगे, बात ठीक है। कोई एक पैर तो आता है, शरीर के द्वारा। (बाबा कंपनात्मक प्रदत्त तरंग से ज्ञान का उद्घाटन होता है, इसमें जो है.. ) कौन सा कंपन कहाँ, मेधस तंत्र में जो कंपन पैदा हुआ, ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा, जो मेधस तंत्र में जो कंपन पैदा हुआ, तो ज्ञानेन्द्रियों में क्या हुआ, वो ज्ञानोदय जीवन को हो जाता है, ये लिखा है महाराज। प्रश्न : अच्छा जीवन सीधे जो है, किसी कंपन से ज्ञान प्राप्त नहीं करता क्या?
उत्तर- पहले तो इतना तो समझो, बाद की बात वो, यहाँ तक ठीक हुआ की नहीं।