प्रश्न : जीवन कंपनात्मक गति के माध्यम से बिना मेधस को प्रयोग करते हुए, स्वयं में समझता है, ये थोड़ा सा छूट गया बाबा, फैल गया थोड़ा मामला और ठीक से समझना चाहते हैं?
उत्तर : यही बात कहा है, बिना मेधस की सहायता की सम्बंधो का पहचान होता है, होने का साक्षात्कार।
प्रश्न : बाबा जीवन तो यहीं बैठा है, उसको साक्षात्कार दूर की चीज़ों को कैसा करेगा?
उत्तर :जीवन में जो होता है ना, जीवन में अक्षयबल, अक्षयशक्ति कार्य करता है, ये बताया गया। अक्षय शक्ति दूर-दूर तक, अपने को फैला के देखने की व्यवस्था रखा है। (बाबा तो क्या जीवन का पुंज वहाँ तक फैल के जाता है?) ‘‘कल्पना” कल्पनाएँ फैलती हैं, अध्ययन के समय में वो वस्तु तक फैलता है।
प्रश्न : पुँज वहाँ तक फैल जाता है, अगर मैं दिल्ली के बारे में सोच रहा हूँ, तो मेरा पुँज यहाँ भी है, दिल्ली तक फैल गया।
उत्तर :प्रमाणित होने की स्थिति में। ठीक है?
प्रश्न : बाबा थोड़ा सा ये बात स्पष्ट नहीं हो रहा है, जैसे जीवन है, इस पूरे शरीर में भ्रमण करता है, यही उसका कार्य, गतिपथ है। तो जब मैं सामने वाले पहाड़ के बारे में सोचने लगता हूँ, तो क्या ये कार्य गतिपथ बढ़कर पहाड़ तक पहुँच जाता है?
उत्तर : आपका विचार शक्ति पहुँचता है, और शक्ति और बल दो बात कहा है आपको, शक्तियाँ दूर-दूर तक फैल जाती हैं। उसका माध्यम है, वातावरण।
प्रश्न : कैसे होगा?
उत्तर : कैसे होगा! तरंग विधि से होगा।
प्रश्न : बाबा मतलब ये तरंग से बाजु वाला कण में फिर बाजु वाला कण में ऐसा।
उत्तर : इस ढंग से हो कर दिल्ली तक हम connect हो जाते हैं।
प्रश्न : माने भौतिक रासायनिक परमाणु हैं, यहाँ से बैठ के मैं दिल्ली के भौतिक रासायनिक परमाणु को हिला पाता हूँ।
उत्तर : हाँ, करते ही हैं। आप ना मानो ये ठीक है, अच्छे अदमियों का काम है वो करते ही यही हैं, धंधा-पानी।
प्रश्न : अच्छा और वो जो कंपन जो लौट के आता है?
उत्तर : उसको जो है ना, सुनने की अर्हता जीवन में होता है। वो संकेतों को ग्रहण कर लेता है।