प्रश्न : बाबाजी जैसे रेडियो में करते हैं, या टेलीविजन में करते हैं, आस-पास की चीज़ों को कंपित करा देते हैं।
उत्तर : वैसे ही है वो। ये जो है ना micro, micro, micro किसी micro frequency में, जीवन संकेत प्रकृति के साथ दौड़ता है। उसका जो दौड़ने का प्रतिक्रिया क्या होता है? दौड़ के आना, क्रिया का प्रतिक्रिया समान। उस आधार पर बात बनता है।
प्रश्न : मतलब रेडियो और टेलिविज़न का जो कार्य प्रणाली है, वो जीवन में समाई है वो और ज्यादा सूक्ष्म है।
उत्तर : वो जीवन में समाई है, बहुत सूक्ष्म रूप में होता है। इस ढंग से हम ज्ञानार्जन करने की विधि रखी हुई है। और ज्ञानार्जन किये तो क्या होगा? उसको विवेक में, विज्ञान में, पहनाना होता है। उसको एक तरीका, arrangement देना होता है। इसका नाम है, विवेक और विज्ञान। विवेक में क्या हो जाता हे पूछे? लक्ष्य को पहचानना होता है। विवेक का अंतिम प्रयोजन विवेचना, विवेचना का अंतिम प्रयोजन लक्ष्य को पहचानना। लक्ष्य को पहचानने के क्रम में शरीर का कोई मतलब नहीं है, मेधस तंत्र का मतलब नहीं है, इसीलिए विवेक का प्रयोगों को हम पूरा का पूरा ज्ञान के ही स्थिति में हम कर लेते हैं। उसके बाद आता है विज्ञान। विज्ञान में दिशा निर्धारित करना पड़ता है, उसके साथ क्या होता है, तो जो प्रक्रियाओं का चित्रण बनता है। कैसा वो दिशा निर्धारित होगा, वो चित्रण बनने लगते हैं। वो चित्रण जो है ना शब्द से जुड़ता है। शब्द पुनः अर्थ से जुड़ता है, संप्रेषणा होता है एक दूसरे के। अभी जो हम कर रहे हैं, वो ही कर रहे हैं।