उत्तर : प्रमाणित करने के बाद कर दिया हूँ, ये आवाज निकलता है। शुरुआत जो है अध्ययन से हम जान लिया, वो जानने की कोई प्रक्रिया पहले से है ही। उसी प्रक्रिया से या दूसरे उनसे संभावित प्रक्रिया से मैं प्रमाणित होता हूँ, या हो जाऊंगा, हो सकता हूँ, इस ध्वनि में आता है, इसका नाम है मानना। जैसा- कोई आदमी खाना बना रहा है। उसको एक आदमी देख रहा है, मैं भी कर सकता हूँ, इस जगह पर आते हैं । वो प्रक्रिया को जानना तो हो गया खड़े-खड़े, उसके बाद एक निश्चित विधि से हम इसको कर सकता हूँ, करूँगा, कोई ना कोई जगह। करूँगा जगह में आते है, तो संकल्प हो गया, कर सकता हूँ ,के जगह में हम मान लिए, कर दिया जगह में प्रमाणित हो गए।
प्रश्न : जानने के बाद प्रमाणित होने के बीच में क्या दूरी है?
उत्तर : दूरी कूछ भी नहीं है हमारे बेवक़ूफ़ी के अलावा। जानने, मानने की दूरी की यदि कल्पना करेंगे वो हमारा बेवकूफी के अलावा दूसरा कोई वस्तु नहीं है। जानने और प्रमाणित होने के बीच भी दूरी नहीं है। अगर दूरी है, इसका मतलब जाना ही नहीं है। ये कितनी भारी प्रहार है, आज के intellects अधमरा हो जाता है। जानने का प्रमाण मानना है, मानने का प्रमाण पहचानना है, पहचानने का प्रमाण निर्वाह करना है, निर्वाह करने का प्रमाण है, प्रमाण को पुनः जानना। क्या बात है! ये चार ही पैर से चलेगा।