वो ही चीज़, समस्या पैदा करने के लिए जितने भी अध्ययन करते हैं, जैसा धरती को बरबाद करने के लिए अध्ययन किए, ये ऋणात्मक अध्ययन है। आपके सामने गवाहित है। ये जीतने भी adulteration करने के लिए अध्ययन किए हैं, ७० मंज़िल के घर में रहते हैं, adulteration का काम करते हैं, ये ऋणात्मक अध्ययन है।
corruption के लिए, उनको कैसा बरबाद किया जाए, इन को कैसा लूटा जाए, इन को कैसा नख मारा जाए, ये जो सोचते हैं ये अध्ययन है, ये ऋणात्मक अध्ययन है।
प्रश्न :तो क्या विज्ञान का जितना अध्ययन है, ऋणात्मक अध्ययन है?
उत्तर : आप आगे चलकर के खुद ही मूल्यांकन करोगे, हम एक सूत्र दिया है।
प्रश्न : जो ऋणात्मक अध्ययन है अगर वो धनात्मक अध्ययन के रोशनी में होता है तो सार्थक होगा? क्या ऐसा कहा जा सकता है?
उत्तर : ऋणात्मक रहेगा ही नहीं रे। ऋणात्मक धनात्मक जो शक्तियों का अध्ययन है, इन शक्तियों का अध्ययन भौतिक संसार की है। आचरण का ये अध्ययन है, आचरण का अध्ययन में ऋणात्मक आचरण में आदमी दुखदायी होता है। पूरकता विधि को पहचाने बिना धनात्मक अध्ययन होगा नहीं। एक छोटा सा कैपसूल में कितने सारा चीज़ रखा हुआ है, देख लीजिए। गलती को वर्णन करने में कौन सा महत्वपूर्ण भूमिका होगा जिस में हमारा कौन सा सम्पदा या सम्मान होने वाला है? संसार को कौन सा सम्मान होगा?
प्रश्न : हम को ये संपदा जो मिली है, आपको अन्तर्मुखी विधि से ही मिली है, जो आज हम सुन रहे हैं।
उत्तर : नहीं। ये मिला है हमको अन्तर्मुखी विधि को परीक्षण करने में, मूल्यांकन करने के क्रम में मिल गया। संयम में अन्तर्मुखी नहीं है। समाधि हुआ, ये अन्तर्मुखी विधि से हुआ। उससे कुछ मिला नहीं। मैं जिन सवालों का उत्तर खोज रहा था मिला नहीं। उसमें जो है, प्रचलित संयम की विधियों को हम छोड़ दिया, उसकी सिद्धियों की अपेक्षा हम छोड़ दिया। हमने अपने ढंग से संयम का डिजाइन किया, उसमें प्रयत्न किया तो ये सब आ गया।
प्रश्न : समाधि के बिना संयम संभव नहीं होगा?
उत्तर : ये ठीक है, इसमें हम सहमत है। किन्तु संयम से प्राप्त वस्तु है पुनः वो संयम से मिलेगा, इसको हम छोड़ दिया, उसको हम काट दिया, उसमे बिल्ली कटाई हो गई। हम ऐसा गुजरे आप ऐसा गुजर सकते हैं। 2,000 करोड़ bifercation से हम कहीं पहुँच गए, तो आपको सीधा रास्ता हम लगा लिया।
प्रश्न : समाधि के बाद या समाधि के आस-पास आदमी को जो सिद्धियां मिलता है, वो शास्त्रों में भी लिखा है, आपने सोचा सिद्धियों के चक्कर में आपको नहीं पड़ना है। आपने बिल्कुल उसका निर्वाह किया, दूसरा समाधि के बाद संयम की स्थिति में सिद्धियां आती हैं, वो भी छोड़ दिया। उसके बाद जो आपका मूल सवाल था, उस उत्तर के प्राप्ति के लिए आपने संयम किया, आपको जवाब मिल गया।