उत्तर : जो जवाब मिला हमको, उसको हम शनैः-शनैः अध्यवसायिक विधि से लगाने पर पता चला मानव के लिए संपदा है। पहले हमारे लिए संपदा है, अब ये मानव का संपदा है। तब पता चला हमको जो मिली हुई है, ये मानव का पुण्य का फलन है, ऐसा हम conclude करते हैं। उसको बड़प्पन कहो, अच्छा कहो, बुरा कहो, हमको जो अंतरात्मा से समझ में आता है, हम जो निर्णय कर पाया, वो यही है। क्योंकि इतनी बड़ी भारी चीज़ के लिए हम खोज ही नहीं किए थे, कहीं ना कहीं मानव जाति की आवश्यकता रही होगी तभी आई। उसमें और एक चीज़ हम देखा, इससे बड़े मुखोल और कुछ नहीं हो सकता। इसको मुखोल कहा जाए। इतने दिग्गज विद्वान, ये तिनका के ओट में पहाड़ रख करके, सारे आदमी को कगार में ला लिया मृत्यु की, वो कैसे हमारे हाथ में लग गया, हम सोच-सोच के हैरत हूँ। इसमें कोई बहुत बड़ी भारी चीज़ नहीं हुई है, आपको सही बता रहा हूँ। व्यापक की बात पहले से कहा है। दूसरा वस्तु के बात भी बहुत कहा गया है, परमाणु का बात भी बहुत कहा गया है।
अब संकट की तरीका को भी मूल्यांकन कर चुके हैं, संकट की बहुत सारी गांठों को आदमी सूंघ-सूंघ के देख लिया है। इसमें ये सूझ क्यों नहीं आया, केवल व्यापक को लेने के लिए गए वो बर्बाद हो गए, केवल वस्तु को लेने गए ये भी बर्बाद हो गए, ये दोनों का योगफल में क्या निकलता है, उसको एक बार try करने के लिए एक आदमी प्रयोग नहीं किया, ये एक आश्चर्यजनक बात है! हम जैसा एक निरीह आदमी, संसार के सामने एक निरीह हूँ मैं, नगण्य हूँ, छोटा आदमी हूँ, छोटे से छोटा आदमी हूँ। ऐसा आदमी के हाथ में इतनी बड़ी एक पूँजी हाथ लग जाना। बहुत ही मुखोल, बहुत आश्चर्यजनक बात, मौलिक। इसमें एक ढील, पोल, कहीं भी कोई संध में नहीं है। अब अस्तित्व में इसके अलावा कुछ है भी नहीं है। व्यापक और इकाई, इसके अलावा वस्तु ही नहीं है। पूरा वस्तु इतने में मुट्ठी में आता है। अब इतना दिन इतने मेधावी, इतने तपस्वी, कितना कथा सुनते हैं तपस्वियों का, कहीं आप पार पाओगे क्या? हम जो इतना प्रयत्न किया, हमारा एक sincerity हमारे पास है। वो वाइअबल है। वो मौलिक है, उसमें हमको ढील पोल नहीं दिखा। हम जो करना चाहे वो कर डाले, खत्म हो गई बात। जो परिणाम हो जाए, हो जाए। परिणाम कौन हमको पता नहीं था। परिणाम जो मिला महाराज जी, वो फल परिणाम अमूल्य। जैसा-जैसा हम फैलाते जाते हैं, लगता है ये एक ही धरती के आदमी नहीं हैं, सर्व धरती के आदमी के लिए ओढ़नी है ये। ऐसा लगता है हमको। भले हम अत्याशावादी हो गये हों, या आशावादी हो गए हों, हम ये नहीं कह सकते। असलियत ऐसे ही है। अच्छा, कौन सा मोड़ मुद्दा छूटता है? इतना जटिलतम प्रश्न था ये, अन्तर्मुखी बहिर्मुखी, किसी बाप का योग्यता नहीं हुआ इसका कोई जवाब निकाल सके। सारा आय आय टी (IIT) मर गया, वो लिखे है बहिर्मुखी होने से विज्ञान विकसित होता है, अंतर्मुखी होने से आवश्यकता कम होता है। आवश्यकता बढ़ जाने से विज्ञान की विकास होता है, आवश्यकता कम होने से अंतर्मुखी होने से विज्ञान की विकास नहीं होता है। इसीलिए थोड़ा देर आवश्यकता को कम करने के लिए अन्तर्मुखी थोड़ा देर रहेगें और थोड़ा देर बहिर्मुखी भी रहेगें। ये कुल एसन्स पार्ट ऐसा लिखा हुआ है। इसको क्या लिखा है वो? ह्यूमनिज़म नाम रखा है, “मानववाद”, ये लिखा है। थोड़ा देर अंतर्मुखी रहो, जब आवश्यकता काम हो जाएगी, थोड़ा देर बहिर्मुखी रहो, विज्ञान विकसित हो जाएगी, आपका आवश्यकता पूरा हो जाएगा। ऐसा वो कहते हैं, क्योंकि वहाँ पे सब विज्ञान के विद्यार्थी हैं, उनको ऐसा लिखना ही है।
बहिर्मुखी होने से व्यापकता के साथ हम जूझना है। बहिर्मुखी होने से एक-एक के साथ जूझना है। दोनों जगह में जूझने की बात, संघर्ष करो तो क्या गलती बोला है महाराज? “जीने दो और जियो” कहाँ आता है इसमें? यदि दोनों विद्या