में, अन्तर्मुखी में भी आप जूझते रहो, संघर्ष करते रहो, बहिर्मुखी में भी जूझते रहो, संघर्ष करते रहो। राहत का स्थली कहाँ है? तो उसमें ये पाया IIT के नक़्श में अन्तर्मुखी की नाम लें, बहिर्मुखी की जो बात है संग्रह करने वाला, उसको पक्का कर लें।
प्रश्न : धनात्मक अध्ययन में आपने 3 स्टेप्स बताए। पहला अध्ययन, द्वितीय प्रयोग और अभ्यास, तृतीय उपलब्धि। इसमें अध्ययन पूरा हो गया इसका क्या प्रमाण है?
उत्तर : अध्ययन पूरा हुआ इसका मतलब है हम प्रमाणित करने के लिए उद्यत हो गए, प्रयोग और व्यवहार के लिए।
प्रश्न : ये तो साथ-साथ चलेगा, अध्ययन भी चलेगा, प्रयोग और अभ्यास भी चलेगा।
उत्तर : अध्ययन काल में तीन स्टेप्स हैं। उसको बाद में बताएंगे। अध्ययन हो गया के बारे में अभी चल रहे हैं। अध्ययन होने के बाद प्रयोग और व्यवहार में हम आ जाते हैं। वो प्रमाणित होना शुरू करते हैं। उपलब्धि के रूप में, अनुभव का प्रमाण। अनुभव जो है, जैसा हम बोध हुआ, उसको प्रमाणित करने के लिए प्रवृत्ति हुई, उसका नाम है संकल्प, उस संकल्प का नाम है ऋतम्भरा। सत्य भरी हुई संकल्प का नाम है ऋतम्भरा। क्या सुंदर सुखद नाम है आप सोच लो! वो प्रमाणित होने ले लिए जब चल देता है व्यवहार में और प्रयोगों में समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व प्रमाणित होता है। ये प्रमाणित हो गया, हमारा अनुभव का प्रमाण यहाँ हो गया व्यवहार में। जब कभी भी हम संकल्पित हो गए, हमारा अनुभव का pulses चलने लग गए। धक-धक-धक, वो जो उड़ाते हैं ना गाड़ी, ऐसा उड़ने लगता है। उसके बाद उसको कोई रोक नहीं सकता है। हम संकल्प कर लिया हमको प्रमाणित होना है, उसको रोकने वाला ताकत इस अस्तित्व में नहीं है। प्रमाणित हो के ही रहेगा वो। कितना अद्भुत बात है। ऋतम्भरा की बात कहाँ से आ गई, समझदारी को प्रमाणित करने की बात है।
प्रश्न : अध्ययन होने के बाद, संकल्प के बीच में रुक सकते हैं?
उत्तर : संकल्प के बाद रुक नहीं सकता। संकल्प से पहले, बोध होने के बाद, प्रवृत्ति यदि नहीं होता है प्रमाणिकता के लिए, taste नहीं बनती है, उस जगह में आदमी रुक सकता है, बोध के बाद।
प्रश्न : प्रवृति नहीं बनती को बाबा ठीक कर दीजिये ।हिम्मत नहीं बनती ऐसा कहिए ।
उत्तर : कुछ भी कारणों से कहिए , पहले आयु आता है , स्वयं का मूल्यांकन आता है, मूल्यांकन में स्वयं का लाइफ स्टाइल की इतिहास आता है। ये सब को ले करके आदमी कहाँ रूक जाता है, इसको बताया नहीं जा सकता, इसको बताने की जरूरत भी नहीं है कहता हूँ मैं।बहुत डिटेल में जाता नहीं क्योंकि हम को उसमें कोई प्रयोजन दिखता नहीं। इस ढंग से एक स्थली तो है ये।
प्रश्न : एक बारीक सवाल - जहां तक रुकने की सम्भावना बनी रहती है, उस स्थिति को हम बोध नाम दे सकते हैं? उत्तर : उसको थोड़ा सा टेस्ट करना पड़ेगा। इसका एक मिसाल निकला, डॉ चावला । अंतिम भाषा उन का ये रहा, हमको ये बताया, देखिए इससे अच्छा कोई प्रोजेक्ट नहीं है। अभी तक तो धरती में इससे अच्छा प्रोजेक्ट निकला