नहीं है। इसमें पूर्णतः हम सहमत हूँ। हमको लगता है हमको करना भी चाहिए। वो ही लखन झा की एक आदमी बिहार में ऐसे ही बोला। किंतु चावला का व्यक्तत्व ये था, हमारा लाइफस्टाइल जैसे भी हम ले के चले आएँ हैं, उसको हम बदलते हैं, तो लाइफस्टाइल जो पीछे वाला है, बदलने वाला जो स्वरूप है, उसमें हमारे घर के लोगों को ही भरोसा दिलाने में हम असमर्थ हैं। एक कष्ट वो अपना बताए। इसलिए हम लाइफस्टाइल के रहते, हम इसको बदलने में असमर्थ हूँ, ये उन्होंने अपना ध्वनि बताया। एक तो model ये हुआ।
एक बिहार के लखन झा के एक आदमी हैं, वो दरभंगा विश्वविद्यालय में उप-कुलपति रहें हैं। वो आदमी पहले दिन से ही नौकरी में एक रुपया ले कर बाक़ी सब को दान करता रहा। स्वतंत्रता के बाद वो गांधी स्मारक के लिए डोनैट करता रहा, वो करता रहा। उन्होंने अंतिम बात ये हमको बताया हम शंकराचार्य जी के साथ,मिश्रा ,जैसा उन्होंने काम किया था,बोले मैं आपके साथ वैसा काम करना चाहिये , किंतु हमारा आयु ऐसी जगह में पहुँच गया है हमारा आँख काम नहीं करता है, हम करने में असमर्थ हूँ। उनका एक अनुस्मरण यहाँ उद्धारण करना चाहते हैं, हम गए उनके गाँव। गाँव जाने के लिए एक नदी पार करना था। नदी में घुटने भर पानी।गाड़ी इस पार छोड़ करके , पार करके जब उनके गाँव में enter हुए, गाँव की शिष्टता को देखा गया, जो गली इतना, यदि आदमी थोड़ा सा टेढ़ा होकर के चलना है, नहीं तो इस तरफ़ की काँटा या इस तरफ़ की काँटा कपड़े को ले लेगा। जबकि काफी घर 50 मीटर पीछे हैं। इतने अच्छे लोग हैं! जब उनके घर गए, उनके घर के सामने संयोग से एक विशाल मैदान। घर के दरवाज़े के अंदर पहुँच करके “मैं नागराज”। खड़े हो गए वो आदमी। राम रहीम के बाद ये बताए “कैसा कृपा हुआ?” “हमारा कृपा ऐसा हुआ आप ये बताओ आपका निष्ठा किसमें है? मतलब तुम बहुत सारा भाषा जानते हो, योग जानते हो, समाधि जानते हो, ध्यान जानते हो, क़ुरान जानते हो, बाइबल जानते हो, ऐसा तुम्हारा ख्याति। ऐसा कौन सा बिंदु है जिसमें आपका निष्ठा है?” मैंने पूछा। उन्होंने बोला, संयोग से या संकोच से, हम चातुर्वर्ण - चार वर्ण, चार आश्रम - में विश्वास रखता हूँ। हम प्याज भी नहीं खाता हूँ। बिहार में वामाचार्य होते हैं, प्याज के बिना वामाचार्य चलता नहीं है। उन्होंने पहले हमको आश्वस्त किया हम प्याज नहीं खाता हूँ, हम शाकाहारी हूँ। हम पूरा सर्विस का समय स्वयं पाकि विधि से व्यतीत किया, अभी हम बच्चों के हाथ का खाते हैं। अभी हम खड़े हैं, बैठे भी नहीं हैं। हमनें बोला “चातुर्वर्ण जो विधि है, द्वेष ईर्षा को छोड़ कर, ये चातुर्वर्ण का कोई गति नहीं है, इसमें आपका क्या कहना है?” वो कहता है कि मैं सहमत हूँ। अब ये बताओ,पहले तुम बोले चातुर्वर्ण में निष्ठा है , चातुर्वर्ण की ये हालत है, तुम्हारी निष्ठा की क्या हालत है? इसी लिए तो हम शहर छोड़ करके गाँव में आकार बैठा हूँ, इससे कुछ नहीं होता है। वो ८० वर्ष के आगे की आयु के आदमी हैं। तो मैंने बोला “तुम्हारा निष्ठा का कीमत क्या होगा? निष्ठा से कुछ निकलेगा नहीं।” उसके बाद हम बैठे।
प्रश्न : बाबा आपने असली बात नहीं बताई - गुरु कृपा का स्वरूप जिसको हम मानते हैं - जन्मों जन्मों की गाँठ जिसको हम ढ़ोते हुए चले आ रहें हैं, उसमें आग लग जाए, आदमी उभर जाए।
उत्तर : सार बात तो यही है। उसके बाद बैठने के बाद १ १/२ घंटा उनके साथ सुख लिए, उसके बाद खाना खाए। उनके शिष्टता विनम्रता, इस भाग को यदि हम ठीक से चित्रित करूँ, उसके सामने अपन सब बोने हैं। दो तीन घंटा उनके साथ रहे।वो आदमी कहा अब आगे की काम क्या होगा? आगे की काम में यदि भीगना है, एक शिविर लगाना चाहिए, मिश्रा बोला। आपको शिविर स्थली को हमें दिखाना होगा, यदि बनता होगा तो रहने के लिए एक जगह,