खाना बनाने का आदमी को दिखाना होगा। बाक़ी हम अपने हाथ-पैर से आएंगे, अपने हाथ-पैर से जाएंगे, हाथ-पैर की पसीने की खाएँगें।आप लोगों को ना हमे खिलना है ना खुशामद करना है। उसने मिश्रा को बोला तुमने सारा समस्या को हल कर दिया। ऐसा बोला वो आदमी वो ध्वनि हमको भी बहुत ख़राब लगा। हमनें मिश्रा को बोला इनके साथ हर स्थिति में हमको सम्मान को बचा करके चलना चाहिए। ये एक सुखद स्मरण बताया। उनका अभी भी हमारे मन में जो स्थान है, उनका शिष्टता, उस आयु की विनम्रता, ये दोनों चीज़ तो हमारे पास हो नहीं सकती। शिष्टता विनम्रता के आधार पर हमको तोला जाए हम बहुत छोटा दिखूँगा।सच्चाई यही है बेटा।आदमी बोला वही शंकराचार्य से जुड़ करके नाम दिया।
अभी यही सबसे बड़ा अड़चन इस देश के लिए, बाकी देश के लिए ये अड़चन नहीं है अंतर्मुखी बहिर्मुखी वाला कचरा, दूसरे देश में ये कचरा पट्टी नहीं है। हमारे देश में ही ये कचरा पट्टी फँसा है। इसको यदि आप बटोर सके, आपका ऐतिहासिक उपलब्धि है। चाहे तुम मानो चाहे ना मानो। तुम्हारा अन्तरात्मा के यदि तृप्ति का वस्तु होगा तो इस कचरा को अलग करा दो। तुम्हारा मानव जाति के साथ बड़ी उपकार होगा। हम बहुत अच्छा भाषाकार नहीं हैं, इसमें सभी फँसते हैं - भाषाकार, कलाकार, वो कार, ये कार, सब कार फँसते हैं। और सबके लिए भाषा बहुत भारी ज़बरदस्त कथा है। वो पकड़ तुम्हारे पास है, वो भाषा हमारे पास नहीं है। आपके पास भाषा है, भाषा के आप धनी हो, हिन्दी जगत में। उसको प्रयोग आप कर सकते हो। वस्तु लगा दो, वस्तु सहित भाषा का प्रयोग करना यदि बनता है, मैं समझता हूँ ये कचरा पट्टी बटोरा जा सकता है। हम तो धक्का-मुक्की दे देता हूँ, फटाफट। अपना मूल्यांकन सही करो, खुश रहो। हम तो धक्का-मुक्की देता हूँ फटाफट, उससे बहुत सारे लोग उखाड़ जाएँगें। ये ग़लत बात नहीं है। अच्छे-अच्छे लोगों का नाड़ी कपकपी में फँस जाता है। क्या किया जाए, कैसे इस आदमी से पेश हुआ जाए, ऐसा होता है। ये तो हमारे साथ घटित घटनाएँ हैं। किंतु आपके पास उस सब को बच करके चलने का भाषा है, कर सके तो कर लो। करने का उद्देश्य होता है तो ये बहुत अच्छा काम है, ऐतिहासिक काम। अंतर्मुखी बहिर्मुखी का झंझट कैसे पटता है, अंतर्मुखी का जितना भी हमारा प्रयास है, घोर अभ्यास है, वो सब समझदारी के केंद्र बिंदु में हम प्रयोजन के रूप में पहचानना शुरू करते हैं। और उसके बाद समझदारी को व्यवहार में समाधान, समृद्धि, अभय, सहस्तित्व रूप में प्रमाणित करें व्यवहार। बहिर्मुखी वाला भी तो यही चाहता है। अंतर्मुखी वालों को भी ये चाहत बन जाए, शायद आदमी जात को दो भाग में फाड़ने वाला अंतर्मुखी बहिर्मुखी, वो फट जाए। ऐसा कुछ किया जाए। ऐसा सोचता हूँ मैं।ठीक है ना।