प्रमाणित हो सकता है, ये हैसियत को यदि हम उभारेगें नहीं, शब्द भी ठीक से सुनेगा आदमी, ऐसा भरोसा किया नहीं जा सकता।
इस ढ़ंग से अध्ययन का तीन step बताया-
पहले परस्परता में विश्वास, उसके बाद शब्द का प्रयोग, श्रवण, उसके बाद शब्द से इंगित वस्तु का बोध।
ये 3 step में अध्ययन सार्थक होता है, इसमें कोई step को छोड़ा नहीं जा सकता। ये बेकार है ऐसा नहीं है, पहले step, अंतिम छत नहीं है। हमको वस्तु बोध होने से ही हम अंतिम step में पहुँचा। वस्तु बोध होने के बाद प्रमाणित होने के लिए प्रवृत्ति, उसके बाद संकल्प, संकल्प के बाद प्रमाणीकरण, व्यवहार मे, ये सारा काम आता है। ठीक है ये। इस ढंग से अध्ययन का तीन स्थिति को मैंने देखा है, इसकी आवश्यकता पर आप हम आगे चल करके संवाद होगा और निर्णय होगा। यदि आवश्यकता है तो इसको पूरा बरकरार रखा जाए। ठीक है?