उसके बाद जो मूलतः अभी पहला जिज्ञासा यही है, अभी हमको आप लोगों ने जो समझाये हैं उसके अनुसार, मध्यस्थ दर्शन मैंने प्रस्तुत किया है, आप जैसे मेधावियों के कर-कमलों में, और इसको प्रस्तुत करने के लिये - प्रस्तुत तो कर दिया, इसका मतलब को यहाँ आप लोग सुनना चाहते हैं, ऐसा आप लोगों का जिज्ञासा है।
मध्यस्थ दर्शन का मूल मतलब यही है - जो विज्ञान से और अध्यात्म से अथवा आदर्शवाद से - दोनों के हाथ में जो नहीं लगी थी, वो चीज़ हमारे हाथ लग गई - उसका नाम मध्यस्थ दर्शन। अध्यात्मवाद में जो प्रतिपादन नहीं हो पाई, अध्यात्मवाद प्रमाणित नहीं कर पाया, अध्यात्मवाद दूसरों को समझाने की तरीका या ताकत पैदा नहीं कर पाया या पहचान नहीं कर पाया, इसका नाम है मध्यस्थ दर्शन। उसी भाँति जो भौतिकवाद है - वो पहचान नहीं पाया या प्रमाणित नहीं कर पाया, बता नहीं पाया, सोच नहीं पाया, इसी का नाम मध्यस्थ दर्शन है। अर्थात विज्ञान और आदर्शवाद - अभी तक दो ही चिंतन आई हैं। आदर्शवादी चिंतन का नजरिया - रहस्य मूलक ईश्वर केन्द्रित चिंतन, ईश्वर से सब कुछ होता है - ये नजरिया है। इसको अपने को अच्छी तरह से हृदयंगम करने की आवश्यकता, इसको ध्यान में रखने की आवश्यकता। मध्यस्थ दर्शन को सटीक एक अपनी मूलतः स्वीकृति के रूप में पाने के लिये इसको याद रखने की आवश्यकता है।
क्या हुआ - आदर्शवाद रहस्यमूलक ईश्वर केन्द्रित चिंतन का अभिव्यक्ति है। हर बात को हम ईश्वर के साथ जोड़ना चाहते हैं। ईश्वर से ही पैदा हुआ, ईश्वर में ही मरेगा, ईश्वर में ही रहेगा, ईश्वर के कृपा से ही हम संबंध पायेगें, इस प्रकार से सारी बात आती है। हम यदि बहुत बड़ी धनी होते हैं, ईश्वर की कृपा से होते हैं। बहुत बड़ी भारी बली होते है तो भी हम ईश्वर की कृपा से होते हैं। बहुत भारी विद्वान होते हैं तो भी हम ईश्वर की कृपा से होते हैं। बहुत बड़ा भारी यश मिल जाता है तो ईश्वर की कृपा से होता है। ऐसा हम हर बात को उसी के साथ जोड़ते हैं। अच्छा मकान मिल गया, ईश्वर कृपा से मिल गया, अच्छा कपड़ा मिल गया ईश्वर कृपा से मिल गया, हर बात को ईश्वर की झोली से जोड़ना चाहते हैं। और उसके मूल में रिक्तता क्या रही - इसमें कोई आपत्ति भी बहुत ज्यादा दिन तक पता भी नहीं लगा है, इतिहास के अनुसार। कुछ बाद में कुछ पता लगा - ईश्वर को पहचाने बिना ईश्वर का झोली कहाँ से आई, ईश्वर की झोली में कैसा डाला जाये। इसके भी काफी चर्चाएं हुई, उसका कोई उत्तर निकला नहीं। इस ढंग से बात हुई। उसका प्रश्न चिन्ह पर कोई चीज़ है ही नहीं है, सबका उत्तर होना ही है। इसका अभी मध्यस्थ दर्शन निष्पन्न होने का कारण में से एक ये हुआ।
उसके बाद जैसे ही विज्ञान युग आया अपने ढंग से आदमी को पढ़ाना शुरू किया। अभी हम समझता हूँ - आदर्शवाद से अधिक जो संसार में यदि शिक्षा में स्वीकृत हुई, वो विज्ञानवाद ही है, भौतिकवाद ही है। इसको पूरा देश स्वीकारा है। सभी देश में एक ही प्रकार से विज्ञान को पढ़ाना देखा गया है। किन्तु मनुष्य उसमें आता नहीं। कैसे नहीं आता है? वस्तु से सब कुछ होता है। रासायनिक भौतिक वस्तु से सब कुछ होता है - ये विज्ञान का कहना है। कथन का सारभूत बात इतना ही है। जबकि ये दोनों से बची हुई चीज़ ‘जीवन’ का पहचान विज्ञान से हुआ नहीं - ये छूट गई। और उधर भी ईश्वरवादी के अनुसार भी जीवन का पहचान नहीं हो पाई। इसलिये आदर्शवादियों ने ये कहा है - जीव और जगत। जगत का मतलब को अपन साधारण रूप में आप भी अनुभव कर सकते हैं - भौतिक रासायनिक संसार को जगत के नाम से अपन अपनी अवधारणा में पा सकते हैं, और जीव के नाम से मनुष्य से लेकर सभी जीवों के साथ मनुष्य को भी जोड़कर के आप एक अवधारणा पा सकते हैं। जबकि वस्तु स्थिति इससे भिन्न है। मनुष्य एक अलग ही