चीज़ है और जीव संसार अलग है, ये दोनों अपने को स्पष्ट दिखता भी है। कुछ समझने चलते है तो समझ में भी आता है। ये इसमें कष्ट निहित हो गई। ये इस ढंग से अध्यात्मवादी मनुष्य को पहचानने में रह गए और उसके साथ जीवन को पहचानने में रह गए। जीव-जीव कहते हुए मनुष्य को ले गये। तो यह जीव में भय की स्वाभाविक प्रवृत्ति बताई गई। वो भय के लिये कोई आश्रय की आवश्यकता बताई गई। वो मूल आश्रय ईश्वर बताई गई, ईश्वर ही सब का भय को दूर करने वाला है। उनका कृपा होने का आवश्यकता है, ऐसा ले गये लोग। उसी की दो शाखा हुआ - पहले ज्ञान ही एकमात्र बात थी। उसके बाद भक्ति को भी लोक मान्यता मिली और लोगों ने भक्ति से भी भय का मुक्ति हो जाती है, ऐसा कुछ परिकल्पना आई। कौन छुड़ायेगा वाला बात आता है, उसमें भी ईश्वर के स्थान पर ये देवता आ गए।
देवता को प्रमाणित करने वाला कोई नहीं है और देवता से भय दूर हो जाएगा - ये हम सब के मन में भरे है। और भय तो मनुष्य की स्वाभाविक गति बताई गई। ठीक है? इस ढंग से भयभीत आदमी ईश्वर को वर करके भी कहीं, सभी भयभीती से मुक्ति हो गया - ऐसा कुछ नहीं मिला। या भयभीती से मुक्त हो गया है - ऐसा व्यक्ति अपने घोषणा भी नहीं कर पाया - हम भय से मुक्त हो गए भाई, भयमुक्त विधि से हम जी रहा हूँ, ऐसा कुछ भी नहीं कह सकते। तो भय से जो मुक्त हुआ है ऐसा जो सोचता है, जैसा सिद्ध हो गए, वो भी ईश्वर का प्रार्थना करना है हमको भय से मुक्ति कराओ, दरिद्रता से छुड़ाओ - वो उनको भी करना है, हमको भी करना है, क्या फर्क पड़ा इसमें? सारा दुख दरिद्रता से छुड़ाने के लिये एक सिद्ध आदमी भी वोही प्रार्थना करना है, और जो आप हम हैं, जो सिद्ध नहीं हैं, हमको भी वोही प्रार्थना करना है। क्या फर्क पड़ी इसमें? ये तो करना ही करना है। इस ढंग से संसार में अभी तक जीव जगत के बारे में आदर्शवादियों का नजरिया यही रहा। जीवों के सदृष्य ही आदमी है।
उसके बाद वो थोड़ा सा और उसमें भरे, ईश्वर कृपा से जीवों के ऊपर करूणा होती है। वो करूणा जो है मनुष्य के ऊपर भी बरसता है। उसी के आधार पर भैंस भी बोला वेद को, घोड़ा भी बोला वेद को, बकरी भी बोला वेद को, मेंढक भी बोला वेद को, ये सब कहना पड़ा - ये सब तो भरे ही हैं हमारे यहाँ। तो इस ढ़ंग से हम फैले। फैल करके हम कहीं के नहीं रह गये। भाषा में बहुत फैले किन्तु प्रमाण के रूप में कहीं नहीं रहे। इन दोनों से हम पीड़ित होकर जब मनुष्य जो समझने वाला है, रोने वाला है, गाने वाला है, हँसने वाला है और पाने वाला है, खोने वाला है, तो इसमें ईश्वर कौन सा चीज़ को छुड़ाकर ले जाता है, कैसा ले जाता है। कौन ऐसा छुड़ा करके ले जाने वाला ईश्वर के अलावा कोई चीज़ होगा तो क्या चीज़ है - उसको एक प्रकार से खोजने की इच्छा हुआ। ईश्वर है तो चीज़ क्या है?
वो चीज़ के रूप में ईश्वर है कि भाषा के रूप में ही है? तो पहले ये भी कह गए थे, कहें हैं, कि शब्द को प्रमाण मानते हैं, वस्तु को प्रमाण मानवे ही नहीं किया - पहले-पहले। वस्तु जैसा आप है, आप गौण हैं, आपका नाम प्रथम है, ऐसा बात हो गई। इस प्रकार की चीज़ें आने से मनुष्य और भी गुमराह हो गया। तो मैं इसको शायद हमारा मूर्खतावश, अथवा हटवश, अथवा परिस्थितिवश, या हमारा स्वविवेकवश, अथवा नियतिवश - कहीं ना कहीं हम इसको लाँघ लिया। ये तो कहीं ना कहीं hotch-potch है, ये स्पष्ट नहीं है और इसका स्पष्ट रूपरेखा आवश्यक है।