जीवों में और मनुष्य में दूरी स्पष्ट है। वो दूरी का रेखा कहाँ है, जीवों में मनुष्यों में कहाँ से अंतर शुरू होता है? ईश्वर और जीव के बीच में क्या संबंध है? यदि ईश्वर है तो वस्तु के रूप में क्या चीज़ है? ये हमारा मूल सवाल थी। एक तो यह थी।
उसके बाद आई कि मोक्ष और बंधन के बारे में काफी बात किया जाता है, चर्चाएँ उपनिषदों में बहुत की गई हैं। ब्रह्मसूत्रों में किया गया है और योगसूत्र में भी किया गया - सभी किए। अपने-अपने ढ़ंग से जो कर सकते थे उस समय में वो सब किये। वो हमारे लिये तो स्पष्ट नहीं हुआ, हमको बोध नहीं हुआ। तो तत्कालीन विद्वानों से, हमको बोध कराने के लिये हमारे तत्कालीन विद्वान सक्षम नहीं हुए, पूरा नहीं पड़ें। फलस्वरूप हम अपने में प्रताड़ित होना, दुखी होना, संकटग्रस्त होना - स्वाभाविक बात रही है। इस ढंग से वो संकट बहुत दूर तक, बाकी जो हम वरीयता बनाये रखे थे, जीने के लिए - फैक्टरी (factory) लगाना, दुकान लगाना, व्यापार करना, वो करना, ये करना, घर में खूब आराम से रहना - ये सब एक प्रकार से वरीयता क्रम लगाये थे, वो धीरे-धीरे एक-एक को लाँघता हुआ आगे चला।
आगे चलकरके एक संयोग से सन् 1947 आया। 1947 में सत्ता हस्तांतरण हुआ हमारे देशवासियों के लिये और उस समय में एक संविधान बनाने की आवश्यकता आई। उसमें जो पहले जैसा संविधान था उसको यथावत स्वीकारा गया। उसमें तीन बात को उद्धृत किया गया - धर्म निरपेक्षता, समानता और गणतांत्रिक शासन प्रणाली - इसको स्वीकारा गया। उसके लिए तरीका अपनाया। वो तरीके बिल्कुल कामयाब नहीं हुआ अभी, किन्तु उस समय में हम यह बात को स्वीकारा कि भाई इस संविधान के तले कोई सही आदमी का मूल्यांकन नहीं हो सकता। वो आज पूरा का पूरा उतर भी रहा है। धीरे-धीरे यदि कोई कोने में नहीं उतरा होगा तो कल उतर ही जाएगा, उस जगह में हम आ गए हैं। ये जुड़ने के बाद इन सभी, जो हम लगाये थे वरीयता क्रम, उसके ऊपर ये चले गए। हमारा संकट इस सब के ऊपर चला गया, हमारा सारा सुविधा, सारा संग्रह, सारा हवीस - इन सब के ऊपर ये पहुँच गया। इसका वर्चस्व हो गया सब के ऊपर, बाकी सब इसके प्रभाव से प्रभावित हो गये, अंततोगत्वा मैं अपने को मानसिक रूप में तैयार किया - इसके ऊपर सोचा जाए, इसका निष्कर्ष निकाला जाए।
मूल में क्या केंद्रित हुई? बंधन और मोक्ष की बात आई, मूल मुद्दे में और दूसरा संविधान के पक्ष में, संविधान का ध्रुवीकरण होता है, नहीं होता है - ये मुद्दे बने। ये दोनों मुद्दे को लेकर पता चला हम जो कुछ भी साधना किया कहो, अभ्यास किया कहो, सोचा कहो या खेला कहो और कुछ भी नाम दे दीजिये, उसका परिणाम में हमको ये पता लग गई कि ये अस्तित्व में जीवन नाम की चीज़ है। सब से बड़ी भारी बात क्या हो गई - जो आदर्शवादियों के हाथ में नहीं लगी थी, विज्ञानियों के हाथ में नहीं लगा है, वो चीज़ है जीवन। दोनों के हाथ में नहीं लगा था। वो जीवन हाथ में लग गई, जीवन हमको समझ में आ गई। मैं जीवन हूँ, इस बात के यकीन मुझमें स्थापित हो गई। मैं ही, कुल मिला करके, अस्तित्व में द्रष्टा, कर्ता, भोगता हूँ। हमको जो कुछ भी बाकी संसार है - जैसे तारागण से लेकर, सूरज चाँद से लेकर, आकाशगंगा से लेकर, धरती से लेकर, हवा से लेकर, पानी से लेकर, मट्टी से लेकर - जितने भी चीज़ हमारे चारों तरफ फैली हुई है, इसके साथ ही में रहता हूँ, इसको छोड़ करके तो हम कहीं जाता नहीं हूँ। इसीलिए ये सहअस्तित्व है, साथ-साथ में होना है, इसका प्रमाण हमको समझ में आ गया।