उसके बाद ये भी आ गई - ईश्वर, जीव और जगत के बारे में जो बात करते रहे, ईश्वर के बारे में ये पता लगा, पहले से एक उपकार तो किए थे हमारे बुजुर्गों ने - ईश्वर व्यापक है। उसको पूछा गया था, उपनिषदों में चर्चा किए हैं, व्यापक का क्या मतलब है? वो कहा ईश्वर ही ईश्वर में व्यापक रहता है, ऐसा बात कही थी। जैसा सोना, सोने में ही व्यापक रहता है, लोहा लोहे में व्यापक रहता है, इस ढंग से बात कहना चाहा। इन चाहत के आधार पर हम संतुष्ट तो नहीं थे, किन्तु ये भाषा तो दे गये थे। तो उसके बाद जब हम देखे एक अस्तित्व की पूरा स्वरूप को, ये सब जगह में फैला हुआ वस्तु है, जिसको हम व्यापक कह सकते है। जो व्यापक रूप में फैला हुआ है, इसी में सभी प्रकृति - माने चैतन्य प्रकृति,( जीवन को हम चैतन्य प्रकृति नाम दिया है ) - तो चैतन्य प्रकृति भी इसी व्यापक वस्तु में निहित है, जड़ प्रकृति - जो रासायनिक भौतिक वस्तुएँ हैं, ये भी इसी में निहित है - ये पता चला।
इसको अच्छी तरह से हमने समझा। ये दोनों समझ में आने के बाद यह पता चला कि मूलतः सहअस्तित्व ही है, प्रकृति और व्यापक वस्तु एक-एक वस्तु में नित्य सहअस्तित्व है, ये बात समझ में आया। इस नित्य सहअस्तित्व कभी भी वियोग नहीं होता है, इसको फाड़ा नहीं जा सकता, ना फटता है, इसको अलग नहीं किया जा सकता, अलग होता नहीं - इसलिए सहअस्तित्व नित्य वर्तमान है, इस ढंग से हम आ गए।
उसी के साथ-साथ ये अभी दूसरा भाग कहा था - आकाशगंगा से धरती तक, धूलि तक, पानी तक, हवा तक, सब के साथ हम रहते ही है। ये दोनों जब प्रमाणित हो गई, इसमें भी सहअस्तित्व ही है, मूलतः सहअस्तित्व ही है, फल भी सहअस्तित्व ही है, और मूल भी सहअस्तित्व है - ये बात स्पष्ट हो गई।
इस ढंग से हम जो भौतिकवाद और आदर्शवाद से छुटी हुई जीवन ज्ञान हासिल होने से ये मध्यस्थ दर्शन और जो भौतिकवाद और आदर्शवाद - दोनों से छुटी हुई थी - सहअस्तित्ववाद। इस ढंग से मध्यस्थ दर्शन, सहअस्तित्ववाद का मतलब में हम इतना निहित अर्थ को देखा है और उसी को स्पष्ट करने के लिए कई विधियों से प्रयत्न किया है। उसका जो चार अध्यायों में पूरा मध्यस्थ दर्शन को लिखा है। पहला अध्याय ये है - मानव व्यवहार दर्शन, दूसरा अध्याय है मानव कर्म दर्शन, तीसरा अध्याय है मानव अभ्यास दर्शन, चौथा अध्याय है मानव अनुभव दर्शन।
अनुभव के बारे में विगत में ये बात सोचा जाता था कि अनुभव को बताया नहीं जा सकता। बिल्कुल उसका उलटा हुआ - यदि सही ढंग से, सटीक ढंग से, उचित ढंग से, कारगर ढंग से और जीने के ढंग से, प्रमाण के ढंग से कोई चीज़ बताया जा सकता है, तो अनुभव ही है - हम यहाँ आ गए। कितना उलटा हो गया, एक दम पलटी खा गई! पलटी खाना यहां से शुरुआत हुई। होते-होते हर मोड़ मुद्दे पर जहाँ-जहाँ व्यर्थता की मान्यता है, उसको सार्थक मान्यता के रूप में परिवर्तित करने के स्वरूप में हर मोड़ मुद्दा आने लगी, वो पलटी खाने लगे।
पलटी खाते-खाते यहाँ आ गई तो बहुत सारे अभ्यास, साधना, योग ये सभी बातें आते हैं, हम ये सब से गुजरे ही थे, इसका भी बात समझ में आ गई, ये सब समझदारी को अर्जन करने के लिए है, ना कि समझदार होने का प्रमाण नहीं है। कहाँ पहुँच गए? ये सारे उपक्रम समझदार होने के लिए इसका प्रयोग करना कोई अनुचित नहीं है, समझदारी यदि लक्ष्य है। यदि समझदारी लक्ष्य नहीं है, ये ही समझदारी है, क्या चीज़? योग, अभ्यास, तप, हवन, पूजा, पाठ, प्रार्थना, पत्री - यही हमारी समझदारी का यदि गवाही प्रमाण बताना चाहेंगे, ये सार्थक नहीं है। ये भी हमको समझ में