भावावेशों से रोना, गाना, नाचना - है ना? और सारा विलाप करना, प्रलाप करना, चीखना, चिल्लाना - है ना? हाथ पटकना, पैर पटकना - ये सब तो हम करके देखें हैं भाई, उससे कुछ भी नहीं निकला। तब हमको ये पता लगा - होना क्या चाहिए? होना ये चाहिए कि हम कम से कम संवेदनाओं का दृष्टा बना रहना चाहिए। इस बात को बुद्ध दर्शन भी शायद उसको तय करता है, निर्देशित करता है या अंगुली-न्यास कहता है, ऐसा मेरा सोचना है। संवेदनाओं को देखते रहने के लिए दृष्टापद वो मानते हैं, ऐसा उनकी सोचने की तरीका है। उनका अष्टांग विधि से ये ही आता है। मेरे अनुसार दृष्टा पद प्रतिष्ठा तभी होता है, तो संवेदनाएँ जो करते हैं उसको हम देखने मात्र से हम दृष्टा नहीं हुए, संज्ञानशीलता में संवेदनाएँ जब नियंत्रित होते हैं, तब संज्ञानशीलता का हम दृष्टा बनते हैं, संज्ञानीयता का हम दृष्टा बनते हैं। जीवन ज्ञान का दृष्टा जीवन ही है - ये बात हम समझे हैं। इसीलिए हम दृष्टा, ज्ञाता, कर्ता, भोक्ता जीवन ही होता है, इस बात को हमने घोषणा किया है।
तो भोगने वाला भी जीवन है, शरीर थोड़ी ही भोगता है दर्द को। जब जीवंत रहता है शरीर, तब तक दर्द, उसके बाद कहाँ दर्द? मरा हुआ आदमी को कहाँ दर्द रहा भाई? जला देते हैं, गाड़ देते हैं, सारा कर्म ही करते हैं। सम्पूर्ण कर्म करते हुए हम देख ही आ रहे हैं। इसलिए जो शरीर को दर्द होता है, ये बात हम को समझ में नहीं आया। पहले हम भी ऐसा ही सोचते थे। जबकि शरीर को दर्द नहीं होता है, जीवन ही दर्द को पहचानता है, फलस्वरूप दर्द से मुक्ति का उपाय खोजता है, ये कुल मिला करके बात आई। उसी क्रम में पहले से हम आयुर्वेद को सोचा है, ज्योतिषी को सोचा है, ये सभी बातों को सोचते हुए चले आए हैंl अभी भी सोचते रहते है, कुछ ना कुछ।
इस क्रम में हमारा सोचना ऐसा हुई- संज्ञानशीलता पूर्वक हम संवेदनाओं को नियंत्रित होता हुआ देख पाते है, संज्ञानशीलता ही सार्थक होता हुआ, प्रमाणित होता हुआ देखते हैं, यही दृष्टा पद प्रतिष्ठा का मतलब है। ऐसे दृष्टा पद प्रतिष्ठा में जागृत जीवन होना स्वाभाविक है - ये मुख्य मुद्दा यहाँ हुआ - जीवन की वैभव, अनुभव का वैभव यही है। स्वयं को दृष्टा पद में पहचान लेना ही अनुभव का मतलब है। मतलब क्या है? स्वयं को दृष्टापद में पहचान लेना और उसको प्रमाणित कर लेना - ये दृष्टा पद प्रतिष्ठा का मतलब है। जीवन जागृति का मतलब यही है, प्रमाणित होने का मतलब यही है और स्वअनुशासित होने का मतलब भी यही है। इस ढंग से मानव महा उपयोगी, सर्वतोमुखी उपयोगी होने वाला जो बात हुई, जाग्रत मानव में ही आता है।
नहीं तो संकीर्णता, कुछ भाग में - हम उपयोगी होने दौड़ते हैं, वो भी अधूरा हो जाता है, कहीं नाक कटा रहता है, कहीं कान कटा रहता है और भद्दगी से भरा रहता है कई कार्यों को, हम संवेदनाओं के साथ जितने भी काम करते हैं, सर्वांग सुंदर तो कोई होता नहीं - ये आपको बताना चाहते हैं। सभी अंग से हम सुंदर रूप में कोई काम कर नहीं सकते, कोई प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर सकते, ना कोई व्यवस्था को हम गढ़ नहीं सकते, ना जी सकते - संवेदनाओं के सीमा में - ये तो बात सही है। वो ही चीज़ आज धरती पर तांडव नृत्य है - कहीं किसी भद्दगी, कहीं किसी भद्दगी, संवेदनाओं में जीने के लिए जो बाध्य किया है, तो आज तक वो बाध्यताएं इसी बात को प्रमाणित करता रहा - ये आप हम समझने योग्य हैं और इसको मूल्यांकन करने योग्य मानव ही है, वो मूल्यांकन मानव जागृति पूर्वक ही करेगा, भ्रम पूर्वक तो करेगा नहीं। मुख्य बात रहा - दृष्टा पद होने का मतलब में।