जीवन क्या कार्य करता है, उसको भी हम अध्ययन किए, अनुभव किए। और उसके बाद शरीर के रूप में क्या कार्य होता है, क्या कार्य को प्रमाणित करता है, इसको भी अध्ययन किए।
तो इसमें दो काम निष्पक्ष पात्र रूप में कार्य आता है - जो शरीर में क्रियावाही ज्ञानवाही - दो क्रिया होती हैं। ज्ञानवाही क्रिया ही जीवन से सम्पादित होते हैं और क्रियावाही क्रियाएँ सब शरीर की व्यवस्था से सम्पादित होते हैं। हाथ, पैर, नाक ,कान - ये सब चीज़ें क्रियावाही क्रियाएँ है - ये सब बना रहता है। किन्तु इसमें होने वाले जो कार्यक्रम हैं, संवेदनाएँ है, ये जीवन के बिना होता नहीं। ये जीवन के साथ ही संवेदनाएँ शुरू होते हैं। जीवन शरीर को पहले जीवंत बनाये रखता है और ज्ञानवाही तंत्र पर अपने संकेतों को प्रमाणित, ज्ञापित करता है और संकेतित करता है, फलस्वरूप शरीर में वो-वो संवेदनाएँ प्रमाणित होते हैं, हर व्यक्ति इसको अनुभव करता है। हर व्यक्ति का माद्दे की चीज़ है ये।
तो उसी क्रम में आपको ये बताया संवेदनशीलता पूर्वक मनुष्य व्यवस्था में जीना बना नहीं। इतने दिन की, हज़ारों, लाखों वर्ष की इतिहास के अनुसार व्यवस्था में जीना बना नहीं। ना तो परिवार व्यवस्था आई, ना समाज व्यवस्था आई। दोनों नहीं आने से पुनर्विचार की आवश्यकता थी। किस विधि से क्या हो गई? संज्ञानशीलता पूर्वक जीना आ जाता है, संवेदनाएँ नियंत्रित होते हैं, फलस्वरूप हम व्यवस्था में जीना प्रमाणित हो जाता है - इस प्रकार से आई। अध्यात्मवाद के अनुसार, आदर्शवाद के अनुसार संवेदनाओं को cyanide दे करके मृत्यु शय्या में सुलाओ, ये कहते हैं। संवेदनाएँ ना हो, ऐसा वो कहते हैं। भौतिकवादी ये कहते हैं - संवेदनाओं में डूबे रहो। बोलिए साहब हम कहाँ जाएंगे? एक कहता है बिलकुल इसको operation करके अलग कर दो, एक कहते हैं उसमें डूबे रहो। अब इसमें कहाँ जाए आदमी? ये सोचने की बात है, ये मुद्दा है। इसमें हमको जो अनुभव हुआ है वो यह है - जीवंत शरीर में संवेदनाएँ होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, एक अलग दल प्रक्रिया नहीं है। ये व्यवस्था के अर्थ में यदि संयत होता है, इसमें कोई मानव परंपरा में अड़चन नहीं है।
यदि व्यवस्था के अर्थ में संयत नहीं होता है, उस समय में मानव परंपरा में सारा परेशानियाँ आई हैं, जो आज भोग रहे हैं। एक प्रकार की जातियां ये कहते हैं सब को मार डालें, हमारा जाति पैदा करें। एक बार बहुत पहले Russia में उनका republican day नाम की चीज़ होता है। China एक सन्देश भेजा - संसार में non-communists सब को मार दिया जाए, क्रम से communist प्रजा को पैदा किया जाए। इस प्रकार से वो शुभ सन्देश भेजा था! ये भी प्रयत्न हुआ, सोचा गया, किन्तु वो घटित नहीं हो पाया। इसी प्रकार से मनुष्य में अनेकानेक ऐसा आवेशित उदगार निकलती है - उसको मार दो, उसको काट दो, इसको मिटा दो - इस प्रकार की चीज़ें जाते हैं - ये सब संवेदनाओं का अतिवाद कहलाया गया। उसी भाँति दूसरे ओर गया अतिवाद - हम जो भक्त हो गए, हम रोने लगे। रोने से क्या हो गया भाई, क्या चीज़ मिल गई? रोने से अच्छा अवश्य लगा, हुआ कहाँ है अच्छा? अच्छा लगना, अच्छा होना में दूरी है कि नहीं है? दूरी को पाटना ज़रूरी है कि नहीं है - ये सोचने की मुद्दा बनता है। इसमें से ये निकल करके आया है।
उसमें हम उसको वरा, अच्छा होने को हम वरा। अच्छा लगने को हमनें नहीं वरा। इससे क्या हो गई, हमको क्या प्राप्ति हो गई? हमको ये प्राप्त हो गई - संवेदनाएँ नियंत्रित होने का दृष्टा मैं बन गया। कितना छोटी सी बात है! -