उत्तर : दुर्घटनाओं को रोकने के क्रम में, दुर्घटना के लिए प्रयत्न अधिक हुआ है, सद् घटना के लिए कम हुआ है। सद् घटना ज़्यादा घटित हुआ है, दुर्घटनाएँ कम घटित हुआ है। बात इतनी ही है, समझदारी के बिना रास्ते में चल नहीं सकोगे आप।
समझदार बनाने से अधिक कोई काम नहीं है।
प्रश्न : इससे हम लोग इनकार नहीं कर रहे हैं बाबा, अभी जब तक मानव जाति प्रक्रिया में है, अभी समझदार बना नहीं है, समझदार बनने के क्रम में है, पर इस बीच में जिन दुर्घटनाओं से गुजरता है बेचारा, तो बचने के लिए आकांक्षी है।
उत्तर : बचने के लिए जैसा हम अभी तक प्रयत्न करते रहे, करते रहे।
प्रश्न : वो अभी पर्याप्त नहीं हुआ है न,इसके बावजूद भी व्यक्ति..?
उत्तर : हमारा कहना है, देखो महाराज, जो प्रयत्न भी साथ चल रहे हैं, दुर्घटनाओं से बचने के लिए। ठीक है? इसके बावजूद दुर्घटनाएं होते ही हैं। तो हमारा कहना ये है - जितना दुर्घटनाएं हुई हैं, वो सद् घटना के अपेक्षा में कम है। किन्तु मानव का कामना जो है, मानव का प्रयत्न है दुर्घटना के लिए ज्यादा काम किया है और सद् घटना के लिए कम काम किया है। इसको याद करके रखिये। आदमी दोहरा है, दोहरा जात। भीतर कुछ होता है बाहर कुछ होता है, अमानव का यही लक्षण है। इसको ध्यान में रख करके बात करिए। तो अभी जो है मानवता से संपन्न होने की कार्य को संपन्न करना हमारा काम है। उसी से मानव के पास शुभ घटनाओं को घटित कराने की ताकत बढ़ेगी। अभी क्या है - कामना करने की बात तो है ही।
दो बात आपको समझने कि आवश्यकता है। पहला बात ये है - मानव का हैसियत। आगे दूसरा बात है - नियति क्रम विधि। नियति क्रम विधि के अनुसार मानव यदि अपने को ताल-मेल बनाता है, नियति क्रम में कोई भी दुर्घटना नहीं है। क्या-क्या चीज़ को छोड़ करके? भूकंप हो गई। ठीक है? अभी जितने भी भूकंप हो रहें हैं, उसमें 80%, 90% मानव ने जितने भी धरती के अंदर जो परमाणु विस्फोट को पैदा किया है, उसका परिणाम है। बाकी 20% धरती के स्वभाव गुण है। धरती में भूकंप होगा, भूकंप कभी-कभी होते रहेगा। उसका निश्चित स्थान, निश्चित गति, निश्चित दिशा बनी रहेगी। उसको जागृत मानव पहचान सकता है। उससे बच सकता है। एक बात हो गई।
उसके बाद चक्रवात, झंझावात, ठीक है, ये चीज़ होगा। ये इस आधार पर होगा, धरती अपने में गतिशील है। धरती की गति के साथ और ग्रह गोलों की जो समीप होना, दूर होना बनता रहता है, समीप होने से धरती पर वायुमंडल का जो दबाव है भिन्न होता है, दूर होने से भिन्न होता है, इस आधार पर झंझावात, चक्रवात होने की सम्भावना बनी रहती है। ये बनेगी, ये दो चीज़ रहेगी। इसको भी जागृत मानव परंपरा इसको पहचान सकता है, उसका निश्चित दिशा होगी, निश्चित तरीका होगी, निश्चित गति होगी, उसको पहचान करके उससे आदमी बच सकता है। ये इससे बनता है ये- शुभ लक्षणों के लिए। बाकी और कोई भी विधा नहीं है, दुर्घटना का कोई विधि ही नहीं है जो मानव यदि घटित नहीं कराता। बाकी सब मानव ने घटित किया हुआ दुर्घटना है।