लिए पुनः जो एक सौ बीसवे परमाणु में माने - भूखे परमाणु 60, अजीर्ण परमाणु 60, एक सौ बीसवे परमाणु में कितने orbits हो जाएंगे, कब वो कितना loose हो जाएगा, कितने क्षण में वो होगा, कितने काल में होगा, ये सब सोचने की मुद्दा बनता है।
प्रश्न : वो भी बाबा जी अगर चार परिवेश मान रहे हैं तब, अगर चार परिवेश हैं तो, पाँचवा परिवेश हो गया तो और बढ़ गया वो।
उत्तर : हाँ वही तो बोला, जबकि जीवन परमाणु में चार परिवेश होता ही है। उसी मे पूरा का पूरा विधि बनता है, बीच में एक होने से, प्रथम परिवेश में दो होने से, द्वितीय परिवेश में आठ होने से, तीसरे परिवेश में 18 होने से और 32 होने से, ये पूरा 61 क्रियाएँ हुईं। इन 61 क्रियाएँ परावर्तन प्रत्यावर्तन पूर्वक 122 क्रियाएँ हुईं, इसको हम count कर लिया हमारे जीवन में।
प्रश्न : तो जीवन के बारे में तो आपका confirmation है, लेकिन गठनशील परमाणु के प्रथम, द्वितीय जो परिवेश हैं, उसमे संख्या के बारे में वैज्ञानिक और आपके मत में ये difference है कि आपका कहना है कि उसमें 200 भी हो सकते हैं।
उत्तर : हाँ होते ही हैं, 200 अंश नहीं होते हैं आपके अनुसार? दो परिवेश ही समझ लो, चार ही होता है क्या? वो कोई ना कोई संख्या में सीमित होगा कि नहीं होगा? तो उसी प्रकार चलते-चलते ये 100 भी होते हैं, 200 भी होते हैं, 400 भी होते हैं, अजीर्ण बनने के लिए ये जितना ज्यादा से ज्यादा हो सकता है, होते जाते हैं, वो टुटते भी जाते हैं। ज्यादा अंश बढ़ते-बढ़ते एक स्थिति में वो टूटने की जगह में भी आते हैं। तो उसके बारे में बताया, मध्यांश की- जो इन सारे आश्रित[1] अंशों को एक अपने निश्चित अच्छी दूरी में अवस्थित करने की कार्य करते-करते वो कहीं भी यदि loss हो जाते है, माने कर नहीं पाता है, उस जगह में अब परमाणु अंश बिखर करके अलग हो जाते हैं। वो दूसरा कोई प्रजाति के परमाणु ही बनाते हैं, या दूसरे कोई परमाणु में घुस जाते हैं,
दो में एक होते रहते हैं। इस ढंग से परमाणु अंशों का स्वतंत्र रूप में कहीं भी बहुत ज़्यादा समय तक स्थिर रहना पता नहीं लगता। इस ढंग से कहाँ पहुँचे अपन, तो जो आप लोग जो परमाणु अंशों के बारे में, जितने भी गठनशील परमाणु में, अजीर्ण और भूखे परमाणु को पहचाने होगें, बहुत अच्छी बात है। उसमें से अंशों का स्थिरता - अजीर्ण परमाणु में जल्दी बदलती रहती है, जितना जल्दी उसमें बदलता है, उसी प्रकार से दूसरा प्रजाति के परमाणुएँ बनते रहते हैं, और दूसरे प्रजाति के परमाणुएँ बनते-बनते परमाणुओं की संख्या बदलती रहती है, घटती रहती है, बढ़ती रहती है, अंशों की संख्या। ये ही ना बात होती है। इतना पर्याप्त है कि नहीं है?
प्रश्न : विज्ञान अंशों के रूप में नहीं देखता, आवेशों के रूप में देखता है। और वो विपरीत आवेश के रूप में देखता है, केन्द्र में धनात्मक और परिवेशों में ऋणात्मक, उनके प्रकार अलग-अलग हैं।
आश्रित: टिका हुआ, सहारा दिया हुआ; dependent, subordinate ↑