को भी समझा ले गये, ये बात बहुत अच्छा काम हुआ। काहे के लिए अच्छा काम हुआ? जीवन को एक परमाणु के रूप में स्वीकारने में सहायक हो गया। इसके लिए ये मदद हो गया। और कोई मदद हुआ है, ऐसा कुछ नहीं है।
और कोई मदद के लिए तो यही- परमाणु bomb बनायेंगें, ये बनायेंगें, वो बनायेंगें, ये मनुष्य का सहायक वस्तु नहीं है। सबसे बड़ी सहायक वस्तु ये हुई, इतना दिन परमाणु-परमाणु का चिल्लाने से अज्ञानी, ज्ञानी, विज्ञानी सब को परमाणु की स्वीकृति हो गई है। इतनी ही सुगमता हुई। जीवन को परमाणु के रूप में कहने से irritation नहीं हुआ। ये जो mass basis पर मैंने कहा। वास्तविक रूप में क्या है - परमाणु होते ही हैं, वो स्वीकारना ही पड़ेगा। ये बात यहाँ तक तो शुभद हो गया।