मानव में, से, के लिए संवेदना और संज्ञानीयता से ही सम्पूर्ण क्रियाएं है। ग्रहण, विसर्जन बाध्यता = संवेदना। स्थानांतरण = गति। परिणाम, परिवर्तन, परिमार्जन = प्रक्रिया। संगठन, विघटन = परिणाम। वर्तमान से भिन्न = परिवर्तन। आशा, विचार, इच्छा, संकल्प में गुणात्मक परिष्कृति = परिमार्जन। भौतिक, बौद्धिक, गुणात्मक उपलब्धि = प्रयोजन। उत्पादन, व्यवहार = नियोजन। यांत्रिक, तांत्रिक, सामाजिक = संयोजन। मानवीय संबंध = गठन। अखण्ड समाज = संगठन। प्रभाव, क्षमता = प्रसारण। स्वागत आस्वादन पूर्वक ग्रहण = आप्यायन क्रियायें स्पष्ट हैं। आप्यायन क्रियाएं मूल्यों को स्वयं में समा लेने के रूप में स्पष्ट है जिसका प्रमाण मूल्यांकन रूप में होना पाया जाता है।
शिक्षा प्रणाली में अपूर्णता ही विधि का ध्रुवीकरण न होना है। यही व्यवस्था पद्धति का संदिग्ध होना है, जो समाज की आद्यान्त समस्याओं का प्रत्यक्ष रूप है।
जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति के विधिवत अध्ययन को सर्वसुलभ बनाना ही समाधान का एकमात्र उपाय है। अन्यथा शिक्षित कहलाने वाले अशिक्षितों पर, धनाढ्य निर्धन पर, सबल दुर्बल पर, पदस्थ अपदस्थ या पदहीन पर अधिकार पाने का प्रयास प्रकारान्तर से किया जाना भावी है। इसके निराकरण में गुणात्मक एकता को स्थापित करना, समग्रता के अध्ययन को सुलभ बनाना एवं विधि व्यवस्था को सफल बनाना ही मानवीय संस्कृति सभ्यता की अक्षुण्णता को पाना है। यही व्यवहारात्मक जनवाद का प्रत्यक्ष रूप है। व्यक्तिवादी वर्गवादी प्रयोग सफल नहीं रहा है।
मानव जागृति के अर्थ में गुणात्मक एकता की संभावना है, भोगात्मक भ्रमात्मक एकता की संभावना नहीं है।
मानव मानवीयता के अर्थ में ही गुणात्मक एकता के लिए तृषित है। अस्तु, न्याय का ध्रुवीकरण उसी सीमा में है। “मानव न्याय का याचक है।” इसलिए संज्ञानशील ही एकता के लिये दिशा है। जो बोध, संबोध, प्रबोध क्षमता के रूप में प्रत्यक्ष है। साथ ही यही अग्रिमता का कारण है एवं गुणात्मक परिर्वतन पूर्वक सतर्कता तथा सजगता के रूप में स्पष्ट है।
संचेतनशील क्षमता ही अनुभव में परमानन्द प्रतिष्ठा, विचार में समाधान प्रतिष्ठा, व्यवहार में प्रेम प्रतिष्ठा है। इस प्रतिष्ठात्रय के लिये मानव अनवरत् पिपासु रहा है। “प्रतिष्ठात्रय ही मानव प्रकृति का लक्ष्य है।” वादत्रय का भी अभीष्ट यही है। इसलिए लक्ष्य की अपेक्षा में ही सही-गलत,