पूर्ण मूल्य में ही जीवन, जीवन का कार्यक्रम स्पष्ट होता है। स्थापित मूल्य के मूल में पूर्ण मूल्य ही मात्र आधार है। जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति केवल सत्ता में ही है।
“ज्ञान ही प्रेम एवं प्रेम ही ज्ञान है।” प्रेम अधिक और कम से मुक्त है, ज्ञानानुभूति ही प्रेम एवं प्रेम का आधार ज्ञान है। यही पूर्णता का प्रधान लक्षण है। स्थापित मूल्य प्रेम की ही स्थिति है।”
समस्त स्थापित मूल्य प्रेम में, से, के लिए ओत-प्रोत है जिसकी सत्यता स्थिर है। यह त्रिकालाबाध है।
सत्ता की स्थिरता एवं जड़-चैतन्यात्मक प्रकृति की त्व सहित व्यवस्था प्रसिद्ध है। उभय प्रकृति में स्थानांतरण का अभाव नहीं है, इसलिए “अनुभव का प्रत्यक्ष रूप संतुलन, समाधान, समृद्धि, सतर्कता, सजगता, सहअस्तित्व एवं अभय है।” मनुष्येत्तर प्रकृति में नियम, नियंत्रण, संतुलन स्पष्ट है।
अभयता ही सामाजिकता का प्रत्यक्ष रूप है, यही प्रबुद्धता का भी परिचय है, जिसके बिना मानव जीवन में स्थिरता नहीं है।
स्थिरता का तात्पर्य मानव में अनुभव से है, अनुभव सार्वभौमिक रूप में स्थापित मूल्य है।
अनुभव विहीन मानव सामाजिक नहीं है। सामाजिकता में, से, के लिए अनुभव क्षमता अनिवार्य है। मानवीयता में ही अनुभव, अतिमानवीयता में अनुभव एवं उसका वैभव (अनुभव की निरंतरता) प्रसिद्ध है।
अमानवीयता में अनुभव क्षमता की न्यूनता पायी जाती है, जो स्पष्ट है।
अखण्ड सामाजिकता ही मानव जीवन की स्थिरता का प्रत्यक्ष रूप है जो स्थापित मूल्यों की अनुभव योग्य क्षमता पर आधारित है। यह शिक्षा एवं व्यवस्था प्रबुद्धता पर आधारित है।
प्रतिभा एवं व्यक्तित्व का संतुलन ही जागृति का प्रत्यक्ष रूप है। यही प्रबुद्धता, संयमता, निर्विषमता, सहजता, अभयता, सामाजिकता, प्रतिभा एवं व्यक्तित्व है।
वस्तुगत सत्य व वस्तुस्थिति सत्य का दर्शन एवं सहअस्तित्व में अनुभव ही व्यक्तित्व एवं प्रतिभा का संतुलन है।
मानवीयतापूर्ण जीवन ही संयत जीवन का प्रत्यक्ष रूप है। इसी की सीमा में किया गया आहार, विहार एवं व्यवहार का सम्मिलित रूप ही व्यक्तित्व है। यही अभ्यास एवं जागृति में पाया जाने