उचित-अनुचित, विधि-निषेध, पाप-पुण्य का निर्धारण होता है। नियम से ही सुख व दु:ख, जागृति व ह्रास दृष्टव्य है।
अनुभवात्मक अध्यात्मवाद का लक्ष्य परमानन्द प्रतिष्ठा, समाधानात्मक भौतिकवाद का लक्ष्य समाधान प्रतिष्ठा एवं व्यवहारात्मक जनवाद का लक्ष्य न्याय और प्रेम प्रतिष्ठा सूत्र है। यही लक्ष्यत्रय केवल संज्ञानशीलता की गरिमा है। यही इसकी क्षमता, योग्यता, पात्रता में गुणात्मक परिवर्तन का मूल कारण है।
जागृति के क्रम में समाधान प्रतिष्ठा की निरंतरता = प्रेम प्रतिष्ठा
प्रेम प्रतिष्ठा की निरंतरता = परमानन्द प्रतिष्ठा है।
प्रेम प्रतिष्ठा ही सतर्कता, परमानन्द प्रतिष्ठा ही सजगता है। वृत्ति व चित्त की एकसूत्रता में समाधान, चित्त व बुद्धि की एकसूत्रता में प्रेम, बुद्धि व आत्मा की एकसूत्रता में परमानन्द प्रतिष्ठा पायी जाती है जो क्रम से प्रतीति, अवधारणा एवं अनुभव है। यही जागृत मानव में, से, के लिए सहज प्रतिष्ठा है।
न्यायपूर्ण व्यवहार = सुख
सुख की निरंतरता = शान्ति
शान्ति की निरंतरता = संतोष
संतोष की निरंतरता = आनन्द
आनंद की निरंतरता = परमानन्द
नियम पूर्ण उत्पादन, न्यायपूर्ण व्यवहार एवं धर्मपूर्ण विचार = मानवीयतापूर्ण जीवन व अतिमानवीयता की ओर स्पष्ट संभावना एवं अध्ययन
मानवीयतापूर्ण जीवन व अतिमानवीयता की स्पष्ट संभावना एवं अध्ययन = निर्भ्रम ज्ञान
निर्भ्रम ज्ञान = विवेक सम्मत विज्ञान
विवेक व विज्ञान = बौद्धिक समाधान व भौतिक समृद्धि
भौतिक समृद्धि एवं बौद्धिक समाधान = सहअस्तित्व