सहअस्तित्व = अखण्डता
अखण्डता = सामाजिकता
सामाजिकता = स्वर्गीयता
स्वर्गीयता = अभय
अभय = सुख, शांति, संतोष एवं आनन्द
मन तथा वृत्ति का निर्विरोध = सुख = अपराधहीन व्यवहार
वृत्ति व चित्त का निर्विरोध = शांति = अन्याय रहित विचार
चित्त व बुद्धि का निर्विरोध = संतोष = आसक्ति रहित इच्छा
बुद्धि व आत्मा का निर्विरोध = आनन्द = अज्ञान रहित बुद्धि
परम सत्य रूपी सहअस्तित्व में अनुभूति = परमानन्द
ऐसी अनुभूति ही चैतन्य प्रकृति का चरमोत्कर्ष विकास है। यही परमानंद है।
परस्पर वैषम्यता और विरोध ही असामाजिकता है।
मानव में आशय चतुष्टय (समाधान, समृद्धि, अभय, सहअस्तित्व) की विषमता ही दु:ख, अशांति, असंतोष एवं अनानन्द है, जो जागृति में न्यूनता है। भ्रमवश व्यक्ति की परस्पर विषमता, असंतुष्टि, असहयोग एवं विरोध है। इन्हीं मतभेदों के प्रकारों से समुदाय एवं वर्ग भावना में मानव प्रवृत्त रहता है। फलत: संघर्ष एवं समरभावी होता है। ये घटनाएं ही अजागृति का द्योतक है।
जागृति क्रम में सार्वभौम समाधान ही शिक्षा व्यवस्था है। इसकी चरितार्थता में परिमार्जन पूर्वक उसे समृद्ध रूप प्रदान करने के लिये मानव इच्छुक है। इस क्रम में मानव की परस्परता में निर्विरोध वर्ग विहीन अखण्ड समाज के प्रत्यक्ष होने तक प्रयास का अभाव नहीं है।
विरोध का विरोध, दमन, विजय प्रसिद्ध है। प्रथम दोनों असफल एवं तृतीय ही सफल पद्धति है। विरोध के विरोध से प्रतिरोध, विरोध के दमन से प्रतिदमन सिद्ध हुआ है। विरोध पर विजय प्रबुद्धता पूर्वक ही सिद्ध है। इसलिये “वस्तुगत सत्य, व्यवहारगत सत्य, विचारगत सत्य एवं अनुभवगत सत्य के प्रति कोई मतभेद नहीं है।”