आरोप और कल्पनाएं अनेक होती है। आधार विहीनता ही आरोप व कल्पना है, आधार केवल प्रमाण ही है।
मानव जीवन के कार्यक्रम के लिये प्रमाणत्रय ही आधार है। “सत्य-सत्यता ही स्थिति है,” जो प्रत्यक्ष है। यही मानव जीवन में प्रमाण पूर्वक समाधान व समृद्धि के रूप में चरितार्थ हुआ है। इसके लिए ही उसमें आशा व प्रत्याशा है।
मूलत: मानव अनुभूति एवं विचार पद में प्रतिष्ठित हैं। अनुभव मूलक व्यवहार, समाधान, समृद्धि मूलक उत्पादन ही मानव जीवन की चरितार्थता है।
स्थापित मूल्यों का अनुभव होता है। उत्पादन पक्ष में समृद्धि ही अनुभव है जिसके लिये ही सम्पूर्ण प्रयास है। यही इस सत्यता को स्पष्ट करता है कि जीवन सहज कार्यक्रम केवल अनुभव ही है।
समाधान ही अनुभव है, स्थापित मूल्य अनुभव है ही। अनुभव की अपूर्णता ही अजागृति है। जागृति के लिए ही शिक्षा व व्यवस्था है।
समाधान स्थापित है, प्रत्येक समस्या के लिए समाधान है, इसलिए अनुभव क्षमता या संभावना ही मनुष्य में पाई जाने वाली विशेषता है, जो जागृति क्रम में स्थितिवत्ता के रूप में दृष्टव्य है।
अभ्युदय सहज महिमा के मूल में अनुभव ही है। अनुभव का दृश्य रूप न्यायपूर्ण व्यवहार है, समृद्धि का दृश्य रूप नियम, नियंत्रण, संतुलन पूर्ण उत्पादन है।
अनुभव केवल स्थिति, स्थितिवत्ता की पूर्णतया स्वीकार क्षमता है। यही जागृति सहज गरिमा है।
सत्ता ही स्थितिपूर्ण है। प्रकृति स्थितिशील है। प्रकृति में विविधतायें है। यही विकासक्रम, विकास, जागृति क्रम, जागृति व्यवस्था एवं स्थितिवत्ता है। ऐसी स्वीकार योग्य क्षमता का होना या न होना ही जागृति क्रम की स्थिति है।
केवल चैतन्य प्रकृति ही अनुभव करती है, उसको ही अनुभव करने का अवसर है।
अनुभूति ही मानव का अभीष्ट है। जागृति स्वयं में सुयोजित क्रम है। गुणात्मक विकास में सहयोगी क्रम ही सुयोजन है। क्रम ही अग्रिमता को सिद्ध करता है।