प्रकृति में पाया जाने वाला “चक्र त्रय” ही व्यवस्था एवं संक्रमण प्रक्रिया को स्पष्ट करता है। इसी क्रम में मानव भ्रांतिपद से देवपद में प्रतिष्ठित होने की संक्रमण प्रणाली में ही उसका अनुसरण करने के लिए बाध्य है।
मानव के देव पद में आरूढ़ न होने की स्थिति में मानवीयता एक आदर्श रूप में प्रतीत होती है। वह दश सोपानीय व्यवस्था में जब सामान्य हो जाती है तब अतिमानवीयता प्रमाण के रूप में सुलभ सहज रहता है।
जागृति को प्रमाणित करने के अर्थ में किये गये सभी कार्य व्यवहार उचित है। जो अखण्ड समाज और सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी के रूप में प्रमाणित होते है। ये सब औचित्यता की कसौटी है।
जो उचित प्रतीत होते हुए भी स्वयं के आचरण में प्रकट न हों, ऐसी समस्त घटनाएँ आदर्शों के रूप में है।
औचित्यता की स्वीकृति से ही संयमता की स्पष्टता को स्पष्ट करती है जो गुणात्मक परिवर्तन के लिए बाध्यता है।
बाध्यताएं जब कटाह स्थिति में आती है तब आचरण में प्रकट होती है।
“तीव्र इच्छा ही बाध्यता है।” इच्छा के कार्य रूप में परिवर्तित होने की जो संक्रमण स्थिति है, वही कटाह स्थिति है। संयमता केवल मानवीयता की सीमा में स्पष्ट है।
संपूर्ण इच्छाएं मूल्यों में, से, के लिए ही हैं।
मूल्यों में, से, के लिए पूर्णता के संदर्भ में इच्छाओं का प्रसव है।
पूर्ण मूल्य, स्थापित मूल्य, शिष्ट मूल्य, उपयोगिता मूल्य एवं सुन्दरता मूल्य ही मूल्य समुच्चय है।
उपयोगिता मूल्य में सुन्दरता एवं सुन्दरता मूल्य में उपयोगिता समाविष्ट हैं।
गुरु मूल्य में लघु मूल्य समाया है।
संपूर्ण मूल्य का केवल अनुभव ही है।
अनुभव केवल सत्य, सत्य ही पूर्ण मूल्य, पूर्ण मूल्य ही प्रेम, प्रेम ही आनन्द, आनन्द ही अनुभव है। इसी का प्रत्यक्ष रूप सजगता है। जो मानव का अभीष्ट है।