इसके बाद और बहुत बड़ी भारी साहसी काम विज्ञानी लोग किए - एक तरफ कहते हैं जन-संख्या बढ़ गई। ये एक प्रकार से समस्या का कारण है। ठीक है भाई। दूसरी तरफ क्या करते हैं - तो हम laboratory में आदमी को तैयार देते हैं। एक आदमी को कितना बनाना है - १ लाख बनाना है - पैसा दो हम बना देते हैं। लाख बनाना है - हम बना देते हैं। करोड़ बनाना है - हम बना देते हैं। आपका प्रतिरूप को बना लीजिए - ये हर दिन पेपेरों में, उसमे, इसमें हम देखते ही, सुनते ही हैं, और जितने भी माध्यम हैं प्रचार के, वे सब तो चिल्लाता ही है। इस ढंग से - इसको क्या कहा जाए? एक तरफ हम ही कहते हैं - जन-संख्या बढ़ गई। दूसरी तरफ विज्ञानी ये सोचते हैं - एक आदमी को करोड़ बना सकता है। उसके लिए वे आकर्षित करते हैं - पैसा दीजिए, बनवा लीजिए। एक करोड़ आदमी बन लीजिए - ऐसा ये कहते हैं।
किसकी बात सुना जाए, किसकी बात सही है? जन-संख्या ज्यादा हुआ - ये सही है? एक आदमी करोड़ आदमी के रूप में बदलना - ये जरूरी है या इसकी आवश्यकता है, ये सच्चाई है या झुटाई है - इस बात को कौन बताएगा? कौन उसका उत्तर देगा? इन दोनों को हम सही ठहरातें हैं, औचित्यता[1] के बारे में कौन जिम्मेवार है? इसमे कौन चीज़ औचित्य है, औचित्यता का कौन निष्कर्ष निकलेगा? औचित्यता को बताने का आधार कहाँ है? अब कहाँ शोध किया, किसने किया, कब किया? ये सब बातें, अनेकानेक सवाल अपने आप से उत्पन्न होता है।
तो अभी आपसे निवेदन किया की मनुष्य जाग्रत होने के उपरांत - क्या जाग्रत होना है? स्वयं पर विश्वास हो जाना, माने स्वयं का अध्ययन पूरा होना, माने जीवन और शरीर - इन दोनों का समुचित अध्ययन हो जाना - स्वयं पर विश्वास रखने का मुद्दा है। यदि ये नहीं होता है, स्वयं पर विश्वास नहीं होगा। मैं कैसा हूँ, क्यों हूँ - इन दोनों का उत्तर होने के बाद स्वयं पर विश्वास होता है। एक मुद्दा ये है। इसके लिए ये सहअस्तित्ववादी विधि से प्रस्तुति किया, जीवन का अध्ययन को हम विधि से प्रस्तुत किए। जीवन में अक्षय शक्ति, अक्षय बल होता है, उसको हम अध्ययन कराते हैं। जीवन में ही कल्पनाशीलता, कर्म स्वतंत्रता निरंतर, माने स्फूर्त होता रहता है और उसको पढ़ाते हैं। कर्म स्वतंत्रता कल्पनाशीलता की तृप्ति बिन्दु चाहिए, इसके लिए मनुष्य सदा-सदा शोध करता रहता है - इसको भी हम पढ़ाते हैं। उसमे तृप्ति बिंदु कैसे मिलता है उसको हम पढ़ाते हैं i कैसा? जाग्रत होने के बाद व्यवस्था के रूप में जीने से कल्पनाशीलता कर्म स्वतंत्रता की तृप्ति बिन्दु मिलती है। ये हम अध्ययन कराते हैं - मैं स्वयं अध्ययन कर चुका हूँ। जो अध्ययन करते हैं, वैसे ही वो भी तृप्त होते हैं और मैं जैसा तृप्त हुआ हूँ, इस आधार पर हम विश्वास करते हैं।
तो समझदारी का दूसरा बिन्दु बताया - अस्तित्व। अस्तित्व स्वयं सहअस्तित्व है, अकेले नाम की चीज़ नहीं है। तो व्यापक वस्तु में एक-एक वस्तु में नित्य वर्तमान है - इसको हम अध्ययन कराते हैं। इसको अध्ययन कराने के बाद ये प्रश्न समाप्त हो जाता है - एकांत में सुख है। अभी तक जो आदर्शवादी विचार - पूरा एकांत में सुख- को खोज-खोज करके क्षत-विक्षत[2] हो गए। ना स्वयं प्रमाणित हो पाया और ना उसके सम्मोहन से छूट पाया। घुटकी से प्राण निकलता ही रहा। हमारा एक परिवार परंपरा में ७०० वर्ष में अनेक लोग सन्यासी होते रहे। एक भी ऐसा एक line दे नहीं पाए जो कि हम इस सन्यास के बाद ये पा गए, जो आप लोग नहीं पाए हैं। ऐसा चीज़ किसी ने कह के नहीं मरा,