और सब ने यही कह के मरा “आप किताब पढ लो”! मेरे अनुसार किताब आदमी लिखता है और हर किताब से आदमी बड़ा है। हर यंत्र से बड़ा है एक-एक आदमी - ऐसा मेरा सोचना है। यदि ये सच है - हर आदमी हर एक यंत्र और हर एक किताब से बड़ा है - तब तो किताब के अंदर मनुष्य को बेड़ लेना संभव नहीं है। किताब को इतना पूजा किया गया, उससे ज्यादा किसी को पूजा भी नहीं किया होगा। इतना पूजा करने के बाद भी कोई आदमी किताब के अंदर समाया नहीं, आज तक।
अभी विज्ञानियों ने यंत्र को इतना प्रमाण बता करके संसार को इतना व्यामोहित[1] किया, सम्मोहित किया और ये भी किया “ये देखो यंत्र स्वचालित होता है,यंत्र जो है ना वो करता है, ये करता है”। ये सब बताने के बाद भी - मनुष्य किसी यंत्र में समा गया - ऐसा कुछ हुआ नहीं, आज भी नहीं हुआ। इस दोनों गवाही के आधार पर मेरा घोषणा ये है - प्रत्येक मनुष्य हर एक यंत्र से बड़ा है, हर एक किताब से बड़ा है - इस बात पर विश्वास रखने के लिए ज़रुरत है। उसके लिए क्या आवश्यक है - हमारा जीवन में अक्षय शक्ति अक्षय बल जो कार्य करता है, उसको सटीक जागृति पूर्वक नियोजित करने की विधि को अपनाते तक समझदारी, उसके बाद प्रमाणित करने की परंपरा। इसको हम अध्ययन कराता हूँ। जो आदमी, जिस आदमी को जिज्ञासा होती है, उनको स्वागत है ही है, वो आ करके अध्ययन करें। एक तो बात ये बना।
उसके बाद अस्तित्व के बारे में गए - अस्तित्व में विकास के क्रम बनी, परमाणु ही विकास के क्रम में वस्तु है और गठनपूर्ण होने पर माने - हर एक परमाणु गठनपूर्वक परमाणु है। गठनपूर्णता नाम की एक प्रजाति है - जिस परमाणु में प्रस्थापन विस्थापन मुक्ति हो जाता है। प्रस्थापन नहीं हो सकती है ना विस्थापन हो सकती है। ऐसी जगह में आने के बाद, उस परमाणु का नाम है - गठनपूर्ण परमाणु। उसमें हमने यह देखा है - बीच में एक क्रिया होता है, जिसका परावर्तन प्रत्यावर्तन दो पद्धति है। इसी ढंग से बीच में एक ही होता है। इसी को हम आत्मा नाम दिया है। आत्मा क्रिया है। अनुभव एक क्रिया है। प्रमाण एक क्रिया है। प्रमाणिकता नित्य क्रिया है। इस ढंग से जागृति क्रिया में प्रमाणिकता ही जीवन का पूंजी है। जीवन का पूंजी के रूप में प्रमाणिकता जब तक समाई रहती है, तब तक मानव स्वयं में विश्वास करता है, करता ही रहता है। और एक बात - जागृति का मतलब - स्वयं मानव अपने को समझ लिया, समझने के बाद प्रमाणिक होता है।
प्रमाणिकता सदा-सदा बना रहता है। एक बार समझने के बाद उसकी निरंतरता होती ही है। एक बार हम कोई झाड़ को देखते हैं, समझ लेते हैं, उसके बाद वो समाप्त होते ही नहीं है। सदा बना रहता है - सदा-सदा झाड़ के नीचे खड़े रहने की ज़रुरत भी नहीं है। वो झाड़ जब कभी सामने आया, उसकी उपयोगिता हमको पता ही है। इसी प्रकार मानव जब कभी एक बार जाग्रत हो गया, उसके बाद उसका निरंतरता होता ही रहता है। तो इस विधि से जाग्रत मानव ही सतत प्रमाणिक रहता है, प्रमाणिकता ही जीवन का सम्पदा है। क्या सम्पदा है? प्रमाणिकता ही सम्पदा है। यही चीज़ परावर्तन में प्रमाणिकता के रूप में हो जाता है, माने प्रमाणित होता है और प्रत्यावर्तन में अनुभव के रूप में होता ही है। ये दोनों क्रिया कर लेते हैं - निरंतर करते रहते हैं। अनुभव के आधार पर ही बाद में बोध नाम की क्रिया, और इच्छा नाम की क्रिया,और विश्लेषण नाम की क्रिया - ये सभी चीज़ें क्रियान्वयन होते हुए, जीवन समग्र एक जागृति
व्यामोहित : हैरानी, मोह, अज्ञान, घबराहट, भ्रांति ↑